संस्कृत व संस्कृति के हिमायती थे महाराजाधिराज : प्रोवीसी

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— महाराजा के ऋणी हैं दरभंगावासी : संजय सरावगी

— समाज को सकारात्मक नजरिये से देखें : डॉ चन्द्रेश्वर प्रसाद सिंह

— संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा में कामेश्वर सिंह व कलाम आजाद की जयंती 

दरभंगा। महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह एवम देश के पहले शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की जयंती पर आयोजित राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के मौके पर अध्यक्षता करते हुए संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोवीसी डॉ चन्द्रेश्वर प्रसाद सिंह ने शनिवार को कहा कि विज्ञान का बीज वेदों व महाभारत में है और संस्कृत शिक्षा समाजिक सरोकारों का,सम्बन्धों का या यूं कहें तो भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र है। उन्होंने कहा कि महान शिक्षाविद महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह का व्यक्तित्व अधुकनिकता का, विकास का एवम राष्ट्रीय सोच का अद्भुत संगम था।वे अंग्रेजों की भाषायी चाल को बखूबी समझते थे। यही कारण रहा कि वे शुरू से ही संस्कृत शिक्षा के हिमायती रहे और इसके सम्बर्धन व संरक्षण के लिए महाराजा ने अपनी अमूल्य सम्पत्ति

समाज व देश हित में दान कर दी। उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ निशिकांत ने कहा कि संस्कृत को वेदों, संस्कारों, व संस्कृति की भाषा बताते हुए प्रोवीसी ने इसकी व्यापकता पर जोर दिया। वहीं उन्होंने महान शिक्षाविद अबुल कलाम आजाद को याद करते हुए कहा कि वे सच्चे राष्ट्रवादी थे और उन्हीं के कारण मैकाले की शिक्षा नीति में बदलवाकर उसे व्यवस्थित किया जा सका। हमारे सभी कर्मी भी कर्तव्यनिष्ठ होकर काम करें यही दोनों विभूतियों के प्रति श्रद्धांजलि होगी।

वहीं दरबार हॉल में आयोजित कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि स्थानीय विधायक संजय सरावगी ने बड़े भावुक होकर कहा कि महाराजाधिराज परिवार का पूरा मिथिला ऋणी है और रहेगा। इसी परिवार के कारण विदेशों में भी दरभंगा का नाम है। उन्होंने सभी से अपील की की महाराजाधिराज द्वारा दान में दिए गए अमूल्य धरोहरों को संयोकर रखने की जरूरत है। पौराणिक भवनों समेत अन्य शिल्पों का निर्माण अब सम्भव नहीं। इसलिए इसका संरक्षण नई पीढ़ी के लिए भी जरूरी है। संस्कृत शिक्षा बढ़े व जन जन की भाषा बने यह महारसजाधिराज की भी कामना थी। इसे विद्वतजनों को ध्यान में रखना चाहिए। अबुल कलाम साहब को याद करते हुए विधायक सरावगी ने उन्हें आधुनिक शिक्षा का पक्का हिमायती बताया । उधर, मुख्य अतिथि आरके कालेज मधुबनी के प्रो0 श्रुतिधारी सिंह ने कहा कि कामेश्वर सिंह संस्कृत के साथ साथ अंग्रेजी शिक्षा के बड़े पैरोकार थे।राजपरिवार के लंबे इतिहास पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने अनुरोध किया कि समाज को सकारात्मक सोच से देखने की जरूरत है।

व्यक्तिवादी सोच से हटकर जनसरोकारों के जो हितैषी हैं या फिर जो समाज हित मे बेहतर काम कर रहे हैं उनकी प्रशंसा जरूर होनी चाहिए। महाराजाधिराज भी सामाजिक समरसता के पोषक थे। प्रजातांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने सिर्फ कई देशों का इसलिए भ्रमण किया कि इलाके की कृषि व्यव्यस्था कैसे सुधारी जाय? किस तरह कल-कारखाने लगे और आमजनों की माली हालत कैसे सुधरे यह चिंता उन्हें खूब थी। देश-दुनिया घूमने के बाद ही लोहट, सकरी, एपीएम समेत कई जगहों पर फैक्ट्रियां लगाई गई।

डॉ श्रीपति त्रिपाठी के संचालन में चले कार्यक्रम में डॉ शशिनाथ झा, कर्मचारी नेता अनिल कुमार झा एवम शोधार्थी प्रमोद मिश्र ने भी विचार रखे। डॉ विदेश्वर झा एवम डॉ दयानाथ झा ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया एवम अतिथियों का स्वागत डॉ सुरेश्वर झा ने तथा धन्यवाद ज्ञापन संयोजक सह डीन डॉ शिवाकांत झा ने किया।

मालूम हो कि आज प्रातः माधवेश्वर परिसर के माँ श्यामा मन्दिर में भी महाराजाधिराज की याद में वृहत स्तर पर पूजा- हवन किया गया। इस मौके पर विश्विद्यालय के कई पदाधिकारी व कर्मी मौजूद थे।

Suvash Chandra Choudhary

Editor-in-Chief

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