चुनावी घोषणापत्र कागज का एक टुकड़ा बनकर रह गया है : चीफ जस्टिस

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नई दिल्ली : देश के प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर ने शनिवार को चुनाव सुधार पर बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा है कि चुनावी घोषणापत्र पर राजनीतिक दलों को जवाबदेह होना चाहिए. उन्होंने कहा कि अब घोषणापत्र कागज का एक टुकड़ा बनकर रह गया है.
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि भारत में चुनावी राजनीति उन सामाजिक समूहों की ‘लामबंदी और राजनीतिकरण’ के इर्द गिर्द केंद्रित है, जो गरीब हैं या वंचित हैं.

 

न्यायमूर्ति खेहर  ‘चुनावी मुद्दे एवं आर्थिक सुधार’ विषय पर एक सेमिनार को संबोधित कर रहे थे. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में बहुमत हासिल करने के लिए जाति का मुद्दा अलग अलग तरह से उठाया जाता है. उन्होंने कहा कि जब से हाशिये पर मौजूद इन लोगों ने बड़ी तादाद में वोट डालने के लिए उमड़ना शुरू किया है, तब से चुनाव नतीजों में एक अभूतपूर्ण अस्थिरता आई है.

 

न्यायमूर्ति खेहर ने कहा कि इस स्थिति ने राजनीतिक पार्टियों को नये तरह के राजनीतिक गठजोड़, सोशल इंजीनियरिंग करने और समर्थन हासिल करने को मजबूर किया है. उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया में इन बदलावों के बावजूद चुनाव वादों का पूरा नहीं किया जाना कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाता.

 

उन्होंने कहा कि चुनाव वादे पूरे किए जाए या नहीं, कोई प्रभाव नहीं पड़ता. हर पार्टी समान विचारधारा वाले साझेदारों में आमराय नहीं बनने का ढिठाई से कोई ना कोई बहाना ढूंढ लेती है. सीजेआई ने कहा कि नागरिकों की अल्पकालिक  याददाश्त होने के चलते ये चुनावी घोषणा पत्र महज कागज के टुकड़े बनकर रह जाते हैं. इसके लिये राजनीतिक दलों को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए.

उच्चतम न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश के बाद दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने भी चुनाव और आर्थिक सुधारों पर जोर देते हुये कहा, ‘क्रय शक्ति का चुनावों में कोई स्थान नहीं है’ और प्रत्याशियों को यह अवश्य ही ध्यान में रखना चाहिए कि ‘चुनाव लड़ना किसी तरह का निवेश नहीं है.’ उन्होंने कहा कि चुनाव अपराधीकरण से मुक्त होने चाहिए.

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