नई दिल्ली : प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल आज खत्म हो गया. इसके साथ ही रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति के रूप में स्थापित हुए. श्री मुखर्जी संभतः देश के पहले ऐसे राष्ट्रपति हुए जिन्होंने जघन्य अपराध व आतंकवाद के कुकृत्य को अंजाम देने वालों को कतई माफ़ नहीं किया.
देश अब उन्हें केवल एक सफल राजनेता, प्रशासक ही नहीं बल्कि एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप में याद करेगा जिन्होंने फांसी की सजा को बरकरार रखने का रिकार्ड बनाया. उन्होंने तीन बड़े आतंकवादियों की फांसी की सजा पर बिना हिचक दस्तखत किये.
प्रणब मुखर्जी ने अपने कार्यकाल में मुंबई के 26/11 हमले के दोषी अजमल कसाब और संसद भवन पर हमले के दोषी अफजल गुरु और 1993 मुंबई बम धमाके के दोषी याकूब मेनन की फांसी की सजा पर मुहर लगा दी. कहना न होगा कि प्रणब बाबू ने बतौर राष्ट्रपति तीन बड़े आतंकी अजमल, अफजल और याकूब को फांसी दिलाने में अहम भूमिका अदा की. कसाब को 2012, अफजल गुरु को 2013 और याकूब मेनन को 2015 में फांसी दी गयी.
बताया जाता है कि श्री मुखर्जी के कार्यकाल में 37 क्षमायाचिका आईं जिसमें उन्होंने अधिकतर में कोर्ट की सजा को बरकरार रखा.
ययह रिकॉर्ड ही कहा जाएगा कि उन्होंने 28 अपराधियों की फांसी को बरकरार रखा. कार्यकाल की समाप्ति से ठीक पहले भी गत मई माह में प्रणब मुखर्जी ने रेप के दो मामलों में दोषियों को क्षमा देने से इनकार कर दिया. इनमे से एक मामला मामला इंदौर का था जबकि दूसरा पुणे का. केवल चार दया याचिका पर उन्होंने फांसी को उम्रकैद में बदला. ये बिहार में 1992 में अगड़ी जाति के 34 लोगों की हत्या के मामले में दोषी पाए गए थे. 2017 नववर्ष पर कृष्णा मोची, नन्हे लाल मोची, वीर कुंवर पासवान और धर्मेन्द्र सिंह उर्फ धारू सिंह की फांसी की सजा को आजीवन कारावास की सजा में बदल दिया.
यह नजीर अब वर्त्तमान राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद एवं आने वाले एनी राष्ट्रपतियों के लिए भी है. देश उम्मीद करता है कि देश हित में अमानवीय कृत्य, जघन्य अपराध और आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए प्रणव मुखर्जी की तरह की दृढ़ता वर्तमान राष्ट्रपति भी दिखाएँगे.