यूजीसी समानता विनियम-2026 को लेकर अग्रवाल वैश्य समाज ने जताई आपत्ति, प्रधानमंत्री को भेजा ज्ञापन

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नए नियम से उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत विभाजन को बढ़ावा मिलेगा : अशोक बुवानीवाला

गुरूग्राम, 29 जनवरी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किए जा रहे यूजीसी समानता विनियम-2026 को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक स्वागत योग्य है। इसी कड़ी में अग्रवाल वैश्य समाज हरियाणा ने इन विनियमों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे भारतीय संविधान की मूल भावना के विपरीत बताया है। समाज की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक विस्तृत ज्ञापन भेजकर इन प्रावधानों पर पुनर्विचार की मांग की गई है।


इस मुद्दें पर अग्रवाल वैश्य समाज के प्रदेश अध्यक्ष अशोक बुवानीवाला ने कहा कि यूजीसी समानता विनियम-2026, संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का खुले तौर पर उल्लंघन करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन नए नियमों से उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत विभाजन को बढ़ावा मिलेगा और सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के अधिकारों का हनन होगा। बुवानीवाला ने कहा कि सरकार का उद्देश्य सामाजिक न्याय होना चाहिए, लेकिन ऐसे नियम जो किसी एक वर्ग के अधिकारों को कमजोर करें, वे न तो न्यायसंगत हैं और न ही देशहित में।

ज्ञापन में यूजीसी समानता विनियम-2026 के कुछ प्रमुख प्रावधानों पर विशेष आपत्ति जताई गई है। इनमें सबसे अहम बिंदु यह है कि आरक्षित वर्ग के विद्यार्थी बिना ठोस प्रमाण के सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकेंगे। समाज का कहना है कि यदि बिना किसी साक्ष्य के शिकायत दर्ज कर किसी विद्यार्थी या शिक्षक का भविष्य प्रभावित किया गया, तो यह गंभीर अन्याय होगा। उन्होंने कहा कि इस तरह के नियम सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को मानसिक दबाव और असुरक्षा की स्थिति में डाल देंगे।


बुवानीवाला ने कहा कि यूजीसी के नए नियमों के तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान में समान अवसर केंद्र का गठन अनिवार्य किया गया है। इस केंद्र की 10 सदस्यीय समिति में एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा, लेकिन सामान्य वर्ग के लिए किसी भी प्रकार का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि जब समिति में सामान्य वर्ग का कोई प्रतिनिधि नहीं होगा, तो उनके साथ निष्पक्ष न्याय कैसे संभव है। समिति को 24 घंटे के भीतर बैठक कर सात दिनों में कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है, जिससे निर्णय जल्दबाजी में और एकतरफा होने की आशंका है। बुवानीवाला ने कहा कि यूजीसी समानता विनियम-2026 से देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित होगी।

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विश्वविद्यालय और महाविद्यालय ज्ञान के केंद्र होते हैं, जहां भयमुक्त और स्वतंत्र वातावरण में अध्ययन-अध्यापन होना चाहिए। लेकिन नए नियमों से शिक्षक और विद्यार्थी दोनों ही असुरक्षा की भावना में काम करने को मजबूर होंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य समाज को जोड़ना है, न कि जाति के आधार पर विभाजित करना। यदि शिक्षण संस्थानों में ही जातिगत भेदभाव को संस्थागत रूप दे दिया गया, तो इसका दूरगामी और घातक परिणाम होगा।


बुवानीवाला ने केन्द्र सरकार से अपील करते हुए कहा कि यूजीसी समानता विनियम-2026 के प्रावधानों को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए या उनमें व्यापक संशोधन किया जाए। समाज ने कहा है कि यदि सरकार ने समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया, तो सामान्य वर्ग के युवाओं में भारी आक्रोश और निराशा फैल सकती है।

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