संसद ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2021 पारित किया

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नई दिल्ली : किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में संशोधन करने के लिए किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2021, को आज राज्यसभा में पारित किया गया। सरकार ने इस वर्ष के बजट सत्र में इस बिल को संसद में पेश किया था। लोकसभा में इसे 24.03.2021 को ही पारित कर दिया गया था।

विधेयक पेश करते समय केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती स्मृति जूबिन इरानी ने व्यवस्था में व्याप्त कमियों के आलोक में असुरक्षित बच्चों की देखभाल व सुरक्षा की जिम्मेदारी जिलाधिकारियों को सौंपने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सभी मुद्दों से ऊपर उठकर बच्चों की मूलभूत आवश्यकताओं को प्राथमिकता देने के लिए संसद की प्रतिबद्धता को दोहराया।

इन संशोधनों में अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट सहित जिला मजिस्ट्रेट को जेजे अधिनियम की धारा 61 के तहत गोद लेने के आदेश जारी करने के लिए अधिकृत करना शामिल है, ताकि मामलों का त्वरित निपटान होना सुनिश्चित किया जा सके और जवाबदेही बढ़ाई जा सके। अधिनियम के तहत जिलाधिकारियों को इसके सुचारू कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के साथ-साथ संकट की स्थिति में बच्चों के पक्ष में समन्वित प्रयास करने के लिए और अधिक अधिकार दिए गए हैं। अधिनियम के संशोधित प्रावधानों के अनुसार, किसी भी बाल देखभाल संस्थान को जिला मजिस्ट्रेट की सिफारिशों पर विचार करने के बाद ही पंजीकृत किया जाएगा। जिला मजिस्ट्रेट स्वतंत्र रूप से जिला बाल संरक्षण इकाइयों, बाल कल्याण समितियों, किशोर न्याय बोर्डों, विशेष किशोर पुलिस इकाइयों, बाल देखभाल संस्थानों आदि के कामकाज का मूल्यांकन करेंगे।

सीडब्ल्यूसी सदस्यों की नियुक्ति के लिए पात्रता मानकों को फिर से परिभाषित किया गया है। सीडब्ल्यूसी सदस्यों की अयोग्यता के मानदंड भी यह सुनिश्चित करने के लिए पेश किए गए हैं कि, केवल आवश्यक योग्यता और सत्यनिष्ठा के साथ गुणवत्तापूर्ण सेवा प्रदान करने में सक्षम व्यक्तियों को ही सीडब्ल्यूसी में नियुक्त किया जाए।

फिलहाल कानून के तहत तीन तरह के अपराधों (हल्के, गंभीर, घृणित) को परिभाषित किया गया है। जिनका बच्चों के मामले में कानून से संबंधी किसी उल्लंघन पर विचार करते समय संदर्भित किया जाता है। हालांकि यह देखा गया है कि कुछ ऐसे अपराध होते हैं, जो ऊपर बताए गई श्रेणियों में शामिल नहीं हो पाते हैं। यह निर्णय लिया गया है कि जिन अपराधों में अधिकतम सजा 7 वर्ष से अधिक कारावास है, लेकिन कोई न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं की गई है या 7 वर्ष से कम की न्यूनतम सजा प्रदान की गई है, उन्हें इस अधिनियम के तहत गंभीर अपराध माना जाएगा।

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