लोक सभा में कोरोना पर चर्चा शुरू : शिवसेना सांसद विनायक भाऊराव ने केंद्र पर पक्षपात करने का आरोप लगाया

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सुभाष चौधरी  

नई दिल्ली : लोक सभा में आज प्रश्नकाल के बाद देश में कोविड 19  की स्थिति पर चर्चा शुरू हो गई. लोक सभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने इसकी अनुमति दी और चर्चा कू सार्थक बनाने की अपील की.  इस महत्वपूर्ण चर्चा का आरम्भ आज शिवसेना सांसद विनायक भाऊराव राउत  ने किया. रत्नागिरी सिंधुदुर्ग महाराष्ट्र के लोकसभा सांसद ने कहा कि कोरोना से लड़ाई में पूरे देश के लोगों ने प्रधानमंत्री का साथ दिया.  कोरोना से लड़ाई में देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी प्रधानमंत्री का पूरी तरह साथ दिया. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र शासन ने प्रधानमंत्री की बातों को आदेश मानकर पूरी तरह अमल किया लेकिन इस मामले में विपक्ष शासित राज्यों के साथ राजनीति भी हुई.

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महाराष्ट्र  को पीएम केयर से मिले वेंटिलेटर में 60% काम नहीं कर रहे

 

शिवसेना सांसद विनायक भाऊराव ने आरोप लगे कि प्रधानमंत्री केयर फंड से हालांकि महाराष्ट्र को कई प्रकार की सहायता दी गई लेकिन जिस पैमाने पर मदद दी जानी चाहिए थी नहीं मिली. उन्होंने कहा कि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री मनसुख मंडाविया की ओर से सभी सांसदों और राज्यों को लिखे गए पत्रों में तो कई प्रकार की तकनीकी सहायता का उल्लेख किया गया है लेकिन इसमें जो कठिनाइयाँ आईं उस और ध्यान नहीं दिया गया. विनायक भाऊराव ने कहा कि पीएम केयर्स फंड से दिए गए वेंटिलेटर में महाराष्ट्र में आज भी 60% काम नहीं कर रहे हैं. जो वेंटिलेटर दिए गए उन एजेंसी से बारंबार टेक्निकल सपोर्ट मांगी गई लेकिन आज तक नहीं मिली।उन एजेंसियों ने दोखा किया. सरकार से पैसे लिए लेकिन उस गुणवत्ता के सामान नहीं  दिए.

शिवसेना सांसद ने कहा कि जिस तरह वेंटिलेटर में खामियां रहीं थी उसी तरह की पीएसी प्लांट में भी कमियां दिख रही हैं. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जिन ठेकेदारों ने ख़राब उपकरणों की सप्लाई की उन पर स्वास्थ्य मंत्री को कार्रवाई करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि 15 सौ से अधिक पीएसी प्लांट में से केवल 300 के आसपास ही चालू हो पाए हैं. इस मामले में भी संबंधित एजेंसी ने सरकारी पैसे तो लिए लेकिन वह ठीक से काम नहीं कर रहा है . शिवसेना संसद ने ऐसी एजेंसी को तत्काल ब्लैक लिस्टेड करने और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की जरूरत पर बल दिया ।

 

कई स्थानों पर निजी डॉक्टरों ने जमकर उगाही की

 

शिवसेना सांसद ने कहा कि राज्य सरकार ने अपने खर्चे पर ही मुंबई में कई बड़े हॉस्पिटल में ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना की और वहां कोरोना महामारी से निपटने के लिए आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराई . उन्होंने कहा कि कोरोना काल में हालांकि डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों ने अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों की सेवा की लेकिन कई स्थानों पर निजी डॉक्टरों ने जमकर उगाही की और अमानवीय कार्य किया । उन्होंने कहा कि कई प्राइवेट हॉस्पिटल्स में डॉक्टरों ने लोगों को जमकर लूटा. वह इंश्योरेंस का सवाल पूछ कर ही उनका इलाज करते थे या उन्हें अपने अस्पताल में भर्ती करते थे. निजी अस्पतालों ने  अनाप-शनाप बिल बनाकर इंश्योरेंस से उगाही की. ऐसे अस्पतालों पर भी कार्रवाई की जरूरत है जिस और सरकार को ध्यान देना चाहिए.

लोक सभा संसद विनायक भाऊराव ने आरोप लगाया कि कई निजी अस्पतालों में कोरोना काल में कोविड-19 से संक्रमित लोगों का इलाज करने के खर्च के नाम पर 15 से 20 लाख रु तक के भी बिल बनाए। उन्होंने कहा कि हमें इस प्रकार की गतिविधि के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है और सरकार को ऐसे अस्पतालों में डॉक्टरों के खिलाफ कार्यवाही करने की व्यवस्था भी करनी चाहिए।

विनायक भाउराव ने सवाल खड़ा किया कि प्रधानमंत्री की ओर से या केंद्र सरकार की ओर से लगातार या दावे किए जा रहे हैं कि 100 करोड़ से अधिक लोगों को वैक्सीन के डोज लगाए जा चुके हैं. लेकिन सवाल उठता है क्या इन 100 करोड़ को कोविड-19 वैक्सीन के दोनों डोज लग चुके हैं ? उन्होंने कहा कि रिपोर्ट से यह पता चलता है कि इस देश में अब तक केवल 38% लोगों को ही कोविड-19 टीके की दोनों डोज लगी पाई है।

वैक्सीन का उत्पादन क्यों नहीं बढ़ाया गया ?

 

उन्होंने कहा कि जब तक इस समस्या का लोगों को पूर्ण समाधान नहीं मिल सकता तब तक हम खुश नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि पहले कोवैक्सीन के लिए 28 दिन का अंतराल दिया गया था फिर इसे बढ़ा कर 6 से 8 हप्ते का अंतराल क्यों किया गया ?  वैक्सीन का उत्पादन क्यों नहीं बढ़ाया गया ? उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से पूछा कि इस देश में 100 करोड़ लोगों को दोनों डोज कब तक पूरे किए जा सकेंगे उनको यह जवाब देना चाहिए।

विनायक भाऊराव ने आरोप लगाया कि इस मामले में ऐसा भी देखने को मिला कि जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं  उन्हें भरपूर सहायता दी गई. यहां तक कि वैक्सीन उपलब्ध कराने के मामले में भी पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाया गया. उन्होंने गुजरात को  अधिक वैक्सीन देने जबकि महाराष्ट्र को अपेक्षाकृत कम वैक्सीन देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने वैक्सीन देने में गुजरात, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की भरपूर मदद की उसी तरह महाराष्ट्र के साथ भी सहयोग करना चाहिए था।

 

वैक्सीन की दूसरी डोज के लिए जो समय सीमा कम करने की मांग

 

शिवसेना सांसद ने चर्चा में मांग की कि  वैक्सीन की दूसरी डोज के लिए जो समय सीमा निर्धारित की गई है उसे कम किया जाए जिससे जल्दी से जल्दी सभी देशवासियों को दूसरी डोज लेने का मौका मिलेगा। उन्होंने माना कि आरंभिक काल में वैक्सीन के प्रति लोग थोड़े डरे सहमे हुए थे लेकिन अब लोग स्वयं सामने आकर वैक्सीन की डोज लगवा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी रिपोर्ट ही इस बात के संकेत दे रहे हैं कि कोविड-19 की विषम परिस्थिति के कारण हमारे देश में 11000 लोगों ने अब तक आत्म हत्याएं की हैं क्योंकि इस परिस्थिति से पीड़ित होकर लाखों लोग बेरोजगार हुए। सरकार को इस बात पर भी प्रकाश डालना चाहिए कि वह ऐसे बेरोजगारों के लिए क्या करने वाली है ?

 

8 करोड लोगों से अब 6-6 हजार रुपए वापस मांगने का काम

 

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने देश के 11 करोड़ किसानों को जो प्रतिवर्ष ₹6000 देने की घोषणा की थी और उनके खाते में पैसे डाले गए. अब जानकारी मिली है कि उनमें से आठ करोड़ लोगों से सरकारी अधिकारियों ने पैसे वापस मांगने के नोटिस जारी कर दिए हैं , इससे लोग परेशान हैं। उन्होंने कहा कि 8 करोड लोगों से अब 6-6 हजार रुपए वापस मांगने का काम केंद्र सरकार कर रही है।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि कोविड-19 के दौरान जिस परिवार के सदस्य की मौत हुई है उनको सरकार की और से मदद करनी चाहिए लेकिन सरकार मदद करने की बजाय अब लोगों से पैसे वापस मांग रही है. उन्होंने कहा कि उन्हें मुआवजे तो नहीं दिए गए लेकिन जो लोग बेरोजगार हुए हैं उनकी व्यवस्था तो सरकार को करनी चाहिए।

 

सारी सरकारी कंपनियों को बेचने में जुट गई

 

उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि आज केंद्र सरकार सारी सरकारी कंपनियों को बेचने में जुट गई है. उन्होंने कटाक्ष करते हुए पीछा कि क्या यह कोरोना का असर है ? उन्होंने कहा कि एयर इंडिया का निजीकरण करने का वह समर्थन करते हैं लेकिन बीपीसीएल को बेचने या उसका निजीकरण करने की क्या आवश्यकता थी ? उन्होंने कहा अब एलआईसी के साथ भी वही व्यवहार किया गया जबकि एमटीएनएल और बीएसएनएल जैसी कंपनियां लगभग मृतप्राय हो चुकी हैं.

उन्होंने सवाल किया कि क्या कोरोना का दुष्परिणाम है कि रेलवे का निजीकरण किया जा रहा है. सरकारी कंपनियों का निजीकरण करने की मजबूरी कोरोना का असर है या कुछ और कारण है । उन्होंने कहा कि यह कदम सही नहीं है. उन्होंने कोरोना से लड़ाई में केंद्र सरकार और राज्य सरकार के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने की वकालत की. उन्होंने कहा कि कोविड-19 का नया वेरिएंट ओमिक्रोन को लेकर सरकार का क्या रवैया होगा उसे भी स्वास्थ्य मंत्री को इक चर्चा के जवाब में स्पष्ट करना चाहिए।

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