दुनिया को चकित करने वाला कौन हैं वह शिक्षक जिनका नाम पीएम मोदी ने मन की बात में लिया ?

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सुभाष चौधरी 

नई दिल्ली : प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में उत्तराखंड के एक शिक्षक का उल्लेख कर लोगों को जल संरक्षण के प्रति संवेदनशील बनने की सीख दी. कौन है यह शिक्षक जिन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद पर्यावरण के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया और अपने इलाके को बंजर पहाड़ी क्षेत्र से उर्वरा भूमि में तब्दील करने का ऐतिहासिक काम कर दिखाया ? इसको लेकर देश में कोतुहल है कि आखिर ये कैसे शिक्षक हैं, जिन्होंने प्रकृति को सवांरने का कठिन बीड़ा उठाया और उसे फलीभूत भी कर दिखाया ?

देश के पीएम मोदी द्वारा उनके नाम का जिक्र करने से पूर्व उत्तराखंड में  ‘पाणी राखो’ आंदोलन के प्रणेता और पथरीली जमीन को हरा-भरा बनाने वाले पर्यावरणविद् सच्चिदानंद भारती को जल संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए दुनिया की जानी-मानी संस्थाओं डब्लूडब्लूएफ और इंटेक की ओर से पुरस्कृत किया जा चूका है. इस देश की सदा परिपाटी रही है कि यहाँ के महान विभूतियों को दुनिया पहले पहचानती है जबकि भारत सरकार व समाज उनकी खूबियों का अहसास बाद में होता है. उनके योगदान की अंतर्राष्ट्रीय गूँज सुनने के बाद उन्हें दिल्ली के तत्कालीन जल संसाधन मंत्री कपिल मिश्रा ने भी भगीरथ प्रयास सम्मान से नवाजा था । सम्मान के रूप में भारती को एक प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न के साथ राजा भगीरथ के साठ हजार पुरखों के प्रतीक के रूप में साठ हजार रुपये की नकद राशि दी गई थी.

प्रधानमन्त्री द्वारा आज उनका नाम लिए जाने के बाद केन्द्रीय शिक्षा मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक ने भी उनके इस योगदान की सराहना की है. डॉ निशंक ईसे पूर्व उत्तराखंड राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं लेकिन उनके कार्यकाल में भारती के योगदान को कोई सम्मान मिला था या नहीं इसका उन्होंने कोई जिक्र किये विना कहा है कि ” एक आदर्श शिक्षक स्वयं को शिक्षण तक ही सीमित नहीं रखता बल्कि अपने दूसरे सेवाभावी कार्यों से भी समाज के लिए मिसाल प्रस्तुत करता है। आज प्रधानमन्त्री श्री मोदी  के कार्यक्रम #MannKiBaat  में देवभूमि उत्तराखंड के ऐसे ही सेवानिवृत्त सेवाभावी शिक्षक सच्चिदानंद भारती भी शामिल थे। ”

केन्द्रीय शिक्षा मंत्री ने अपने ट्वीट में कहा है कि ” देवभूमि में ‘पाणी राखो’ आंदोलन के प्रणेता एवं मशहूर पर्यावरणविद् सच्चिदानंद भारती ने जल संरक्षण के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य किया है। उनको इस पुनीत कार्य के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं, मुझे विश्वास है कि आपके प्रयास हमारे अन्य शिक्षकों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बनेंगे।”

कौन हैं सच्चिदानंद भारती ?

सच्चिदानंद भारती ने उत्तराखंड में ‘पाणी राखो’ कार्यक्रम के जरिए कई गांवों में जंगल तैयार करने और सूखे स्रोतों को रिचार्ज करने का अनोखा कार्य कर दिखाया है. उत्तराखंड राज्य के बीरोंखाल ब्लाक (जिला पौड़ी) के गाड खर्क गांव के मूल निवासी पर्यावरणविद् और सेवानिवृत्त शिक्षक सच्चिदानंद भारती को भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने भी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय पर्यावरण पुरस्कार से  सम्मानित किया है। भारती कोटद्वार के भाबर स्थित घमंडपुर गांव में रहते हैं।

कैसे किया दुनिया को चकित ?

उल्लेखनीय है कि सच्चिदानंद भारती की ओर से वर्ष 1989 में बीरोंखाल के उफरैंखाल में इस आंदोलन शुरूआत की गई थी। इसे जनांदोलन का रूप देने में उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पडा. इसमें स्थानीय लोगों को भी शामिल होने को प्रेरित किया और जल संरक्षण की दृष्टि से उक्त क्षेत्र में छोटे-छोटे  चाल-खाल बनाए. इनमें बरसाती पानी को रोककर जल संरक्षण किया ही साथ ही भूमिगत जल स्तर को सुधारने में मदद मिली. उन्होंने इस क्षेत्र में 30 हजार से अधिक खाल बनाए. इन खालों को उन्होंने जल तलैया नाम दिया। सच्चिदानंद भारती ने पर्यवरण संतुलन की दृष्टि से इन खालों के आस-पास बांज, बुरांस और उत्तीस के पेड़ लगाए। इसका परिणाम यह मिला कि दस साल बाद सूखा गदेरा सदानीर नदी में बदल गया. इसे उन्होंने ‘ गाड गंगा ’ नाम दिया है।  आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उनके इस कठिन प्रयास का ही प्रतिफल है कि गदेरे में तब से लगातार पानी चल रहा है।

सेवानिवृत्त शिक्षक सच्चिदानंद भारती ने इस आंदोलन के तहत बंजर हो चुकी भूमि व जंगल को फिर से हरा-भरा करने की अनुकरणीय कोशिश की. इसमें इलाके के युवाओं, महिलाओं व बच्चों को भी बरसाती पानी रोकने के लिए छोटे छोटे गड्ढे बनाने को प्रेरित किया. उन गड्ढों के आसपास चौड़ी पत्ती वाले पेड़  रोपने की योजना बनाई. इस योजना पर पूरी लगन से काम किया और कुछ सालों के प्रयास के बाद ही वहां हरियाली छाने लगी.  सूखा क्षेत्र गदेरी नदी में तब्दील हो गया. यहां तक कि उन्होंने जंगलों की अंधाधुंध कटाई को रोकने के लिए भी ” दूधतोली लोक विकास संस्थान ” का गठन किया और जन सामान्य के साथ-साथ सरकारी अधिकारियों पर भी उस इलाके में पेड़ों की कटाई रोकने का दबाव बनाया. साथ ही उन्होंने अपने आंदोलन के तहत इलाके में लाखों पेड़ लगाये.

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