15 वर्षीय बालिका रिया यादव की अपील : चलो अपना-अपना गाँव बचाएं………

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रिया यादव

हम सभी के लिए कोरोना वायरस की दूसरी लहर भयानक स्वरूप में आई. इससे पहले यह वायरस का संक्रमण शहरी क्षेत्र में केंद्रित था लेकिन अब इसने ग्रामीण क्षेत्र की ओर भी तेजी से रुख कर लिया है. शुरू में हम सोच रहे थे कि ग्रामीण लोग कम संक्रमित होंगे. यानी इस महामारी के शिकार नहीं होंगे. क्योंकि उनमें रोग से लड़ने की मजबूत प्रतिरोधात्म्क क्षमता है. ग्रामीण लोग कृषि कार्यों में शारीरिक मेहनत अधिक करते हैं. इसलिए शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग अधिक स्वस्थ होते हैं. माना जाता है कि वे जैविक खाद्य वस्तुओं का उपयोग करते रहे हैं और पर्यावरण अनुकूल वातावरण में निवास करते हैं. वास्तव में वे प्रकृति के साथ अब भी जुड़े हुए हैं। कोरोना की इस लहर के आगे अब यह धारणा निर्मूल साबित हो रही है.

ग्रामीण दुनिया हमारी समाज की रीढ़

हमें इस बात का पूरा भान होना चाहिए की ग्रामीण दुनिया हमारी समाज की रीढ़ है. हमें उनका समर्थन करने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि यही वह लोग हैं जो दशकों से हमारे भोजन की व्यवस्था में निरंतर जुटे रहते हैं. मेरा मानना है कि कोरोना से लड़ने के लिए जिस प्रकार डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी जरूरी हैं उसी तरह देश के विकास के लिए किसान भी जरूरी है। अगर यह क्षेत्र कमजोर हो गया तो हमारी हरित और श्वेत क्रांति के लक्ष्य को भारी नुकसान पहुंच सकता है। इससे हम कृषि के साथ-साथ आर्थिक दृष्टि से भी कमजोर हो जाएंगे। अंततः हमारी विकास की गति धीमी पद जाएगी.

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल 664369 गांव हैं. हमारे देश में पिछले कई दशक से ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन की संस्कृति मजबूती से पैर पसार चुकी है. इसका कारण चाहे रोजगार हो या फिर साधन संपन्न जीवन जीने की ललक, हम शहरों में आकर अपने ग्रामीण आधार को भूलने लगे हैं. यहां तक कि वर्तमान पीढ़ी कभी-कभी गांव की ओर लौट कर जाना भी नापसंद करती दिखती है.

प्रकृति रानी की गोद में पहुंचने का एहसास

हमारे माता पिता गांव छोड़कर शहरों में बस गये परंतु वह अक्सर गांव का दौरा करते हैं जो उन्हें वहां की परंपरा के प्रति आज भी आकर्षित करता है. इससे उनकी खूबसूरत बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। वहां आज भी ताजी हवा, साफ पानी और पर्यावरण अनुकूल वातावरण उपलब्ध है जिसका आनंद अतुलनीय है। गांव जाकर आज भी प्रकृति रानी की गोद में पहुंचने का एहसास होता है।

दुर्भाग्य से वर्तमान पीढ़ी या हम युवा आधुनिक परिवेश में इस कदर खो गए हैं की अपने पूर्वजों के योगदान एवं पौराणिक व प्राकृतिक संस्कृति के प्रति हमारा रुझान न्यूनतम हो गया है। हम यह भूल बैठे हैं कि शहरों में रहने वाले हम करोड़ों लोगों का जीवन आज भी ग्रामीण लोगों की मेहनत पर निर्भर है।

युवा पीढ़ियों ने अपने गांव से सीधा कनेक्ट खो दिया

वस्तुतः हम युवा पीढ़ियों ने अपने गांव से सीधा कनेक्ट खो दिया है और गांव के लोग भी हमें अपने से अलग शहरी बच्चे मानने लगे हैं। स्व केंद्रित पीढ़ी होने के नाते हमारी जिम्मेदारी है कि हम तकनीक के सहारे ही स्वयं को गांव के साथ जोड़े रखें और वहां की समस्याओं के प्रति संवेदनशील रहें। हमें अपनी योग्यता व अनुभव का सदुपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी जड़ें जमाने में करना चाहिए। यह सही समय है जब हमें गांव के लिए कुछ करना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि हम सामाजिक भूमिका अदा करने की दिशा में एक संवेदनशील नागरिक की तरह सोचना शुरू करें।

गांव की मदद करने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए.

हालांकि केंद्र और राज्य सरकारें ग्रामीण परिवेश को इस भयंकर महामारी से बचाने का भरसक प्रयास कर रही है लेकिन एक नागरिक होने के नाते हमारा भी इन विपदाओं में कुछ कर्तव्य बनता है। हमें केवल अपने अधिकारों की ही चिंता नहीं करनी चाहिए बल्कि कर्तव्य की दिशा में भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। हमें हमारे गांव की मदद करने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए. यह कहना मुश्किल है की कहां से शुरू करें लेकिन मेरा व्यक्तिगत विचार है कि हमें अपने-अपने गांव की मदद अपनी क्षमता और अनुभव के अनुसार करनी चाहिए. जिस मिटटी से हमारा अतीत जुड़ा हुआ है उसका ऋण चुकाने का यह सही समय है.

हम सभी महानगर में रह रहे हैं. हमें प्रौद्योगिकी, सोशल मीडिया और अन्य आधुनिक माध्यमों का उपयोग कर छोटे-छोटे सामाजिक समूह का गठन करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए. जो लोग एक ही गांव से संबंधित हैं उन्हें आपस में समूह का निर्माण कर आर्थिक योगदान की दिशा में भी सोचना चाहिए. अगर हम अपने अपने पैतृक गांव की मदद करने की मंशा से कदम आगे बढ़ाएंगे जल्द ही यह एक सामाजिक आंदोलन का स्वरूप ले सकता है. सामूहिक प्रयास के लिए हर किसी को बराबरी में कदम आगे बढ़ाने होंगे। ऐसा कर हम अपने-अपने गांव को वर्तमान विषम परिस्थिति में बुनियादी सामान मुहैया करा सकते हैं।

ग्रामीणों को दवा एवं डॉक्टरों की बहुत अधिक आवश्यकता

यह कहना ना होगा कि आज कोविड-19 संक्रमण के कारण उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए मूल निवासी ग्रामीणों को दवा एवं डॉक्टरों की बहुत अधिक आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्र आज भी इस सुविधा से वंचित है। सरकारी प्रयास भी सर्वप्रथम शहरों को प्राथमिकता देता है ऐसे में समूह के सभी सदस्यों को दवा, ऑक्सीजन या फिर आवश्यक चिकित्सकीय सलाह की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी सौंपी जाए ताकि जरूरत के अनुरूप मदद पहुंचाई जा सके.

शहरी क्षेत्रों में तो ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा जिनमें फ्लिपकार्ट, अमेजॉन आदि शामिल हैं के माध्यम से ऑनलाइन सामान आपूर्ति करने की व्यवस्था है. पिछड़े हुए ग्रामीण इलाके इससे वंचित हैं. हमें इस ऑनलाइन व्यवस्था को ग्रामीण क्षेत्रों में भी विस्तार देना चाहिए. इसके माध्यम से शहर की तरह गावों में भी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की जा सकती है. दूसरी सबसे बड़ी आवश्यकता है अस्पताल में बेड और आकस्मिक परिस्थितियों में इलाज के लिए वेंटिलेटर की व्यवस्था करना. हम शहरियों के पास सरकारी और प्राइवेट दोनों प्रकार की सुविधाएं मौजूद हैं. आर्थिक दृष्टि से भी शहर में रहने वाले लोग साधन संपन्न हैं. हम महंगे विला और बहुमंजिली इमारतों में रहने वाले लोगों को सामाजिक योगदान करने के लिए आगे आने की जरूरत है अन्यथा हमारी समृद्धि समाज के लिए अनुपयोगी है. कहा भी गया है कि ” का वर्षा जब कृषि सुखाने ” यानी जब खेती खराब ही हो गई तब बारिश होने से क्या फायदा ? इसलिए समय रहते हम सबको सचेत होने की जरूरत है.

होम क्वॉरेंटाइन के लिए पर्याप्त जगह नहीं

मुझे विश्वास है कि हममें से अधिकतर के पास गांव में जमीन अवश्य होगी. हमें इन्हें स्वास्थ्य केंद्रों में बदलने की पहल करनी चाहिए. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी संयुक्त परिवार की संस्कृति जीवित है. ऐसे में छोटे-छोटे घर जिनमें अधिकतम दो कमरे ही हैं यदि कोई सदस्य कोविड-19 वायरस से संक्रमित हो जाता है तो उन्हें होम क्वॉरेंटाइन के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिलती है. इसलिए स्वास्थ्य केंद्रों या खेतों में बनाये गये कोविड आइसोलेशन सेंटर का उपयोग उनके लिए किया जा सकता है. इस व्यवस्था से ऐसे परिवार के अन्य सदस्यों को इस संक्रमण से बचाया जा सकता है.

इसके अलावा हमें गांव के लोगों को मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सहायता प्रदान करनी चाहिए जो कि अभी पर्याप्त नहीं है. अधिकतर ग्रामीण लोग मजदूरी के काम में लगे हुए हैं और अपने परिवार से दूर शहरों में रह रहे हैं. इस स्थिति में समृद्ध जमींदार या व्यावसायियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए की ऐसे लोगों को नियमित और समय पर उनका मेहनताना मिले. एक तरफ लॉक डाउन की मार तो दूसरी तरफ परिवारों से दूर रहने का दुख झेल रहे मेहनतकश मजदूरों की जिंदगी कोरोना संक्रमण ने दूभर बना दी है. हो सके तो उन्हें उनके परिवारों तक पहुंचने में भी मदद करनी चाहिए।

केंद्र और राज्य सरकार ने टीकाकरण का अभियान चलाकर सराहनीय काम किया है. अब बड़ी निजी औद्योगिक एवं व्यावसायिक कंपनियों को भी कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत गांव तक टीकाकरण की सुविधा पहुंचाने में अपना अहम योगदान अदा करनी चाहिए. ग्रामीणों को टीके लगवाने के लिए भी जागरूक करने की जरूरत है.

सामाजिक समर्थन भी बहुत महत्वपूर्ण

ग्रामीण परिदृश्य में हर घर में कम से कम एक व्यक्ति है जो काम करता है. अपने जीवन यापन के लिए आजीविका का साधन जुटाता है. उनके पास अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी है. इन दिनों में ऐसे लोग काफी तनाव से गुजर रहे हैं. विभिन्न संगठनों द्वारा किए गए आकलन से पता चलता है की तनाव से निपटने के लिए सामाजिक समर्थन भी बहुत महत्वपूर्ण है. हर व्यक्ति को परिवार, दोस्त, पड़ोसी और रिश्तेदार के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित कर उनके लिए भरसक सहायता का हाथ बढ़ाना चाहिए।

सामाजिक नेटवर्क आज के समय में अवसाद से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. तनाव को स्वास्थ्य बिगड़ने का गंभीर कारण माना जाता है. कमजोर प्रतिरोधात्मक क्षमता से लेकर ह्रदय रोग के जोखिम तक इसके ही परिणाम हैं.

हमें यह शपथ लेने की जरूरत है कि कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में एक दूसरे को प्रेरित करेंगे और संक्रमित लोगों की मदद करने के लिए मजबूती से हाथ बटायेंगे. जो लोग कोरोना वायरस से लड़ रहे हैं उनके लिए मदद का हाथ बढ़ाने का हम वायदा करते हैं.

नोट : लेखिका, सेक्टर 10, गुरुग्राम निवासी रिया यादव, डी ए वी स्कूल, सेक्टर 14 की 11वीं कक्षा कामर्स की छात्रा है.

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