अदालतों में सरकार ही सबसे बड़ा वादी : मोदी

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दिल्ली उच्च न्यायालय के स्वर्ण जयंती समारोह

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा स्थापित करने की वकालत

 

नई दिल्ली : देश की अदालतों में सरकार ही सबसे बड़ा ‘वादी’ है . न्यायपालिका के बोझ को कम करने की जरूरत है. यह विचार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के स्वर्ण जयंती समारोह को संबोधित करते हुए व्यक्त किये. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का अधिकांश समय ऐसे मामलों की सुनवाई में लग जाता है जिनमें सरकार एक पक्ष होती है. उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा स्थापित करने की भी वकालत की.

न्यायपालिका पर बोझ

दिल्ली उच्च न्यायालय के स्वर्ण जयंती समारोह में उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का सबसे अधिक समय सरकार के ऊपर खर्च करती है. उनके अनुसार अगर मामलों पर ठीक ढंग से विचार करने के बाद केस दायर किये जायें तो न्यायपालिका पर बोझ कम किया जा सकता है.उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर एक शिक्षक सेवा से जुड़े किसी मामले में अदालत में जाता है. उसे जीत हासिल होती है तो इस न्यायिक आदेश को आगे के लिए आधार बनाया जाये.  इससे  हजारों की संख्या में मुकदमों को कम किया जा सकेगा .

46 प्रतिशत में सरकार ही एक पक्ष

सेवा मामलों से लेकर अप्रत्यक्ष करों तक विभिन्न अदालतों में कम से कम 46 प्रतिशत में सरकार ही एक पक्ष है. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अभी तक वाद नीति को अंतिम रूप नहीं दे पायी है. कई राज्यों ने हालांकि विधि मंत्रालय के 2010 के मसौदे के आधार पर अपनी अपनी नीतियां बनाई है. तात्कालिक चलन को ध्यान में रखते हुए चुस्त दुरूस्त किये जा रहे वाद नीति के मसौदे में यह स्पष्ट किया गया है कि उस परमपरा से तौबा करने की जरूरत है कि प्रत्येक मामले में अंतिम निर्णय के लिए अदालतों की राह चुनी जाये.

आईएएस की सोच हमेशा राष्ट्रीय स्तर की 

सरदार पटेल की जयंती पर अखिल  भारतीय लोक सेवा के गठन के संबंध में उनकी भूमिका याद करते हुए मोदी ने कहा कि नीतियों को लागू करने के लिए अधिकारी केंद्र और राज्यों के बीच सेतु का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण के कारण जिलों में तैनात आईएएस अधिकारी की सोच हमेशा राष्ट्रीय स्तर की हो जाती है.

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में माना कि  यह विवादास्पद विषय है लेकिन अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए. मोदी ने कहा कि चर्चा लोकतंत्र का सार तत्व है.

कब से मामला लंबित है ? 

साल 1961, 1963 और 1965 के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन का पक्ष लिया गया था लेकिन इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया जा सका. तब कुछ राज्यों एवं उच्च न्यायालयों ने इसका विरोध किया था. इसके बाद 1977 में संविधान में संशोधन किया गया जिससे  अनुच्छेद 312 में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का प्रावधान किया जा सके. यह प्रस्ताव 2012 में तत्कालीन संप्रग सरकार के दौरान फिर से लाया गया जब इसे सचिवों की समिति की मंजूरी मिली. इस सम्बन्ध में एक कैबिनेट नोट भी तैयार किया गया. लेकिन उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों ने इसका विरोध किया. उन्होंने कहह कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि युवा न्यायाधीशों को उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में प्रोन्नति मिल सके.

विधि विश्वविद्यालयों में युवाओं को प्रशिक्षण

प्रधानमंत्री ने कानून का मसौदा बनाने के संदर्भ में विधि विश्वविद्यालयों में युवा लोगों को प्रशिक्षण देने की भी वकालत की. उन्होंने कहा कि इससे भेदभाव और व्याख्या के दायरे को कम किया जा सकता है.

 

प्रधानमंत्री के अलावा इस समारोह में भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर, केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद , दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी रोहिणी, दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मौजूद थे।

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