मकर संक्रांति अर्थात् सूर्य उत्तरायण में प्रवेश का महान पर्व : पंडित मांगेराम शर्मा

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भारतीय सामाजिक जनजीवन में सूर्य भगवान का मकर राशि में संचरण अति महत्त्वपूर्ण माना जाता है। भिन्न-भिन्न तरीकों से, भिन्न-भिन्न आस्थाओं से किसी रूप में मकर संक्रांति का यह पर्व, भगवान भास्कर का दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर पग पढऩा, एक पुण्य काल माना जाता है। राजस्थान और गुजरात में एक  विशेष पतंगबाजी का उत्सव भी होता है। दक्षिण में यह पर्व (पौंगल) नाम से प्रसिद्धि 
लिए हुए है। बिहार में ही नहीं अपितु समस्त भारतवर्ष में इस दिन तिलादान का बड़ा महत्व है।
 
पंजाब में मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर लोहड़ी बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है तो उत्तरी भारतवर्ष और विशेष रूप से हरियाणा में नववधुएं अपने सास-ससुर,  जेठ-जेठानी और देवर को बड़े प्यार से पुकारते मनाते तरह-तरह के गर्म वस्त्र मिष्ठान बांटते, देते नजऱ आते हैं। सामूहिक गीतों से एक नया ही समा बंध जाने से, मकर संक्रांति के इस पुण्य काल में लिखने बैठने के लिए ही हो रहा था, तभी मेरे टेलीफोन की घंटी बजी और मुझे त्रिवेणी के संगम से आते हुए वेद मंत्रों की ध्वनि सुनाई दी, मुझे आल्हादित कर दिया। उक्त ध्वनि इस पुण्य वेला की मर्म स्पर्शी, मेरे हृदय पटल को छूने वाली वाणी हमारे अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के पं॰ रामनरेश तिवारी पिण्डीवासा कार्यकारी अध्यक्ष (उत्तर प्रदेश प्रदेश चैप्टर) जी की थी। वह त्रिवेणी संगम पर इस महाकुम्भ शाही स्नान के साथ-साथ डुबकी लगाकर अपने सेलुलर फोन से यज्ञ पर बैठने से पूर्व आर्शीवाद दे रहे थे।
 
यह धार्मिक निष्ठा परम्परा जो आदर्श रूप में हमारे परिवार की एक धरोहर है, उसके पालन किये जाने पर आल्हादित होना स्वाभाविक है। अपितु इस पुण्य लाभ का कुछ अंश टेलीफोन के माध्यम से मेरे कर्ण रंध्रों में डालकर मुझे भाव-विभोर कर दिया, हालांकि मैंने स्वयं भी कई बार संगम के इस पावन जल में डुबकी लगाई है। एक बार तो प्रयाग के इसी स्थान में देवरहा बाबा के पुण्य दर्शन का लाभ और आशीर्वाद प्राप्त किया। लेकिन इस बार की वेदाध्वनि का प्रात:काल अपने सहयोगी के माध्यम से श्रवण ने मेरी धार्मिकतंत्री को झंकृत कर गया।
 
हमारे यहां हमारे शास्त्रों में दान तथा अन्न से तीनों आश्रम के पालन का भार गृहस्थी पर डालकर उसको अनुभव कराया गया है कि जैसे नदी स्वयं अपने जल नहीं पीती और प्राणी मात्र के लिए उसके तट खुले रहते है, वैसे ही उसको अपने लिए उपार्जित धन का उपयोग स्वयं नहीं करना है। अपने घर का द्वार सदा ही खुला रखकर भिक्षा के लिए आने वाले ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और सन्यासी का पालन करना है।
 
त्यागमय भावना से गृहस्थी को इस प्रकार ओतप्रोत कर दिया है। वानप्रस्थ और सन्यासी का जीवन तो है ही त्यागमय। उनके पास तो भोग के लिए कुछ भी छोड़ा नहीं गया। यहां तक की सन्यासी को संसार के समस्त सम्मान का अधिकार बनाकर भी उसको मान-सम्मान से सदा दूर रहने को ही कहा गया है। उसके लिये कहा गया है – 
                           असम्मानात्तपोवृद्धि: सम्मानातु तप:क्षय:। 
‘असम्मानता से उसके तप की वृद्धि होती है और सम्मान से तप का नाश।’ 
 
वर्ण-व्यवस्था का सौन्दर्य भी ऐसा ही है। एक ओर तो ब्राह्मण को सारे समाज का गुरू बताकर पूजा तथा प्रतिष्ठा का अधिकारी ठहराया गया है, दूसरी ओर उसको यह आदेश दिया गया है – 
 
सम्मानाद् ब्राह्मणों नित्यमुद्धिजेत विषादिव। 
अमृतस्येव चाकाक्ष्ङ देवमानस्य सर्वदा।। 
 
‘ब्राह्मण सम्मान को विष मानकर उससे सदैव उदासीन रहे और अपमान को अमृत मानकर सदा उसी की इच्छा करें।’ भोग की दृष्टि से संसार का सारा सम्मान ब्राह्मण के चरणों में अर्पण होना चाहिए। किन्तु त्याग यह है कि यह उसको विष मानकर उससे उदासीन रहे। इसलिए यह कहा गया है- 
 
अर्चित: पूजितो विप्रो गौरिव सीदति।
 
‘जिस ब्राह्मण की ‘पूजा, प्रतिष्ठा तथा सम्मान किया जाता है’ वह दुही हुई गौ की तरह सूख जाता है।’ हमारा शास्त्र पुकार-पुकार कर कह रहा है कि हमें हमारे समाज को कभी विचलित नहीं होना चाहिए। हमारा इतिहास त्याग और तपस्या का इतिहास है। हम तुच्छ सांसारिक कार्यों के लिए उत्पन्न नहीं हुए अपितु अपने प्रकाश से दूसरों को प्रकाशित करते रहने के लिए हमने जन्म लिया है। अत: इस पुण्य काल में, संगम के इस स्नान अवसर पर दृढ़ प्रतिज्ञ होकर अपने धर्म ध्वज को फहराते हुए अपने समाज को उन्नति के सौपान पर ले जाना है तो सबको मिलकर अपनी आभा मण्डल पर भ्रम जाल आवरण को खण्डित करना होगा। महाकुम्भ में हम तरह-तरह के नए-नए शंकराचार्य का निर्माण भ्रम जाल फैलाने के लिए होता देखते है। उसी प्रकार तरह-तरह के कभी कोई तो कभी कोई ब्राह्मण महासभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष अपने आपको घोषित करके भ्रम जाल के आवरण फैलाकर आपकी और हमारी सबकी एकता अपने मूल स्वरूप को पहचानने को धूमिल करते है। अत: हम आपसे प्रार्थना करना चाहते है कि अपने मूल स्वरूप की पहचान को यथावत् रखे तथा एकता में आबद्ध होकर अपनी दृढ़ता कायम रखे। 
 
रात्रौ तु प्रदीषे निशीये वा मकर संक्रमे द्वितीय दिनऽपिपुण्यम् (माधव)
 
भारतीय ज्योतिष के अनुसार मकर-संक्रांति के दिन सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर हुआ परिवर्तन माना जाता है। मकर संक्रांति से दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा और रात्रि छोटी होने से अंधकार की अवधि कम होगी। यह सभी जानते है कि सूर्य ऊर्जा का अजस्त्र स्त्रोत है, इसके अधिक देर चमकने से प्राणीजगत में चेतना और उसकी कार्यशक्ति में वृद्धि हो जाती है। इसलिए हमारी संस्कृति में मकर संक्रांति पर्व मनाने का व्यावहारिक पक्ष भी महत्त्वपूर्ण है। फलित ज्योतिष में उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र और तुला लग्न में प्रवेश करने वाली पैंतालीस मुहूर्ती संक्रांति अत्यंत शुभ फलकारक कहीं गई है। शनि का उच्चाराशी पर परिभ्रमण तथा उस पर देवगुरू बृहस्पति की सम्पूर्ण दृष्टि राक्षसी-प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करेगी। भारत के पूर्वोत्तर प्रदेशों में मेघ गर्जना के साथ भारी वर्षा होगी। पर्वतीय प्रदेशों में बादल चाल सहित हिमपात तथा मैदानी भागों में शीत लहर चलेगी। यह संक्रांति मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, मकर, कुम्भ व मीन राशि वालों को शुभ व लाभदायक रहेगी। 
 
 मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान तथा गंगा तट पर दान की विशेष महिमा है। तीर्थ राज प्रयाग में मकर संक्रांति मेला तो सारे विश्व में विख्यात है। इसका वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी श्री रामचरित मानस में लिखा है:- 
 
माघ मकर गत रवि जब होई। तीरथ पतिहिं आव सब कोई।।
देव दनुज ंिकंनर नर श्रेनीं। सादर मज्नहिं सकल त्रिवेणी।।
 
स्पष्ट है कि गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर तीर्थ राज प्रयाग में मकर संक्रांति पर्व के दिन सभी देवी-देवता अपना स्वरूप बदल कर स्नान के लिए आते है। अतएव वहां मकर संक्रांति पर्व के दिन स्नान करना अनन्त पुण्यों को एक साथ प्राप्त करना माना जाता है। मकर संक्रांति के पर्व पर इलाहाबाद(प्रयाग) के संगम स्थल पर प्रतिवर्ष लगभग एक माह तक माघ मेला लगता है, जहां भक्तगण कल्पवास भी करते हैं। बारह वर्ष में एक बार कुम्भ मेला लगता है यह भी लगभग एक माह तक रहता है। इसी प्रकार छह वर्षों में अर्ध कुम्भ मेला भी लगता है। मकर संक्रांति पर्व प्राय: प्रतिवर्ष 14 जनवरी को पड़ता है।
 
खगोल शास्त्रियों के अनुसार इस दिन सूर्य अपनी कक्षाओं में परिवर्तन कर दक्षिणायन से उत्तर होकर मकर राशि में प्रवेश करते है। जिस राशि में सूर्य की कक्षा का परिवर्तन होता है, उसे संक्रमण या संक्रांति कहा जाता है। हमारे धर्म ग्रन्थों में पुण्यजनक के साथ-साथ स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभदायक माना जाता है। मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं, गरम मौसम आरम्भ होने लगता है, इसलिए उस समय स्नान सुखदायी लगता है। उत्तर भारत में गंगा-यमुना के किनारे (तट पर) बसे गांवों, नगरों में मेलों का आयोजन होता है। भारतवर्ष का सबसे प्रसिद्ध मेला बंगाल में मकर संक्रांति पर्व पर गंगा सागर में लगता है। गंगा सागर के पीछे पौराणिक कथा है कि आज के दिन गंगा जी स्वर्ग से उतरकर भागीरथ के पीछे-पीछे चल कर कपिल मुनि के आश्रम में जाकर सागर में मिल गयी। गंगा जी के पावन जल से ही राजा सागर के साठ हजार शापग्रस्त पुत्रों का उद्धार हुआ था। इसी घटना की स्मृति में यह तीर्थ गंगा सागर के नाम से विख्यात हुआ और प्रतिवर्ष मकर संक्रान्ति को गंगा सागर में मेले का आयोजन होने लगा। 

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