भारतीय वैज्ञानिकों ने आकाश में ठंढे चमकीले तारों की खोज की

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नई दिल्ली : ग्लोबुलर क्लस्टर एक तारा प्रणाली है, जिसमें एक ही गैसीय बादल से बने लाखों तारे होते हैं। इसलिए, आम तौर पर, इससे बनने वाले तारों में मौलिक तत्वों की रासायनिक संरचना एक समान होती है। लेकिन, ऐसे क्लस्टर हैं जो इस नियम से अलग हैं। इनमें एक है – ओमेगा सेंटौरी, जो हमारी आकाशगंगा में सबसे चमकदार और सबसे बड़ा ग्लोबुलर (गोलाकार) क्लस्टर है।

ओमेगा सेंटौरी के विभिन्न तारों में एक ही धातु-सामग्री नहीं होती है। यह एक मानदंड है, जो इसकी आयु को इंगित करता है, लेकिन इसका रेंज विस्तृत है। तत्व प्रचुरता की विषमता के कारण, निर्माण परिदृश्य सामान्य से अलग हो सकता है। आम तौर पर, प्रचुरता इस धारणा का उपयोग करके प्राप्त की जाती है कि हीलियम, हाइड्रोजन- प्रचुरता का दसवां हिस्सा है।

भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत स्वायत्त संस्थान, भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए) के वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस क्लस्टर के कई तारों का अध्ययन किया और ओमेगा सेंटौरी के धातु-समृद्ध नमूने से उन्होंने हीलियम -संवर्धित ठंढे चमकीले तारों की खोज की। यह कार्य, इस क्लस्टर के लिए किए गए स्पेक्ट्रोस्कोपिक सर्वेक्षण का  परिणाम है, जो पहली बार इन तारों की हीलियम- प्रचुरता को निर्धारित करता है। इस अध्ययन को ‘द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल’ में प्रकाशित किया गया है।

यद्यपि ओमेगा सेंटौरी के एच-कोर बर्निंग मुख्य श्रृंखला तारों (सूर्य की तरह) में हीलियम –संवर्धन के अनुमान हैं, लेकिन यह ओमेगा सेंटौरी में हीलियम-प्रचुरता का पहला स्पेक्ट्रोस्कोपिक निर्धारण है। यह अध्ययन हीलियम –संवर्धन की उत्पत्ति के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य बताता है कि ये पहली पीढ़ी के तारों के धातु-समृद्ध और हीलियम-संवर्धित सामग्री से बने तारों की दूसरी पीढ़ी हैं। यह अध्ययन यह भी बताता है कि मुख्य श्रृंखला वाले तारे, धातु-समृद्ध व हीलियम-संवर्धित ठंढे चमकीले तारों के रूप में विकसित हुए।

अधिकांश तारों में, हाइड्रोजन सबसे अधिक प्रचुरता में पाया जाने वाला तत्व है, लेकिन यदि हाइड्रोजन की प्रचुरता कम होती है, तो हीलियम की प्रचुरता बढ़ जाती है क्योंकि हाइड्रोजन और हीलियम का योग एक स्थिरांक होता है, जबकि अन्य भारी तत्व भी अल्प मात्र में मौजूद होते हैं। आईआईए टीम ने वेन्यू बप्पू टेलीस्कोप, वीनू बापू वेधशाला, कवलूर, भारत में स्थापित ऑप्टोमेट्रिक मीडियम रिज़ॉल्यूशन स्पेक्ट्रोग्राफ (ओएमआरएस) से प्राप्त कम-रिज़ॉल्यूशन स्पेक्ट्रा का उपयोग करके अपना अध्यनन शुरू किया। इसके लिए उन्होंने हाइड्रोजन की कमी / हीलियम संवर्धित तारों की पहचान की।

हालांकि, उन्होंने पाया कि तारों के स्पेक्ट्रा में एच-परमाणु वर्णक्रमीय रेखाएं बहुत मजबूत हैं, और प्रचुरता का विश्वसनीय आकलन ऐसी रेखाओं से संभव नहीं है। इसलिए, आईआईए टीम ने एक ऐसी नयी तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसमें मॉडल वायुमंडल को अपनाया गया। इसमें हाइड्रोजन / हीलियम  अनुपात अलग -अलग थे और इन मॉडलों से अनुमानित प्रकाश उत्सर्जन को निष्क्रिय मैग्नीशियम तथा उच्च-रिज़ॉल्यूशन में एम जी एच आणविक बैंड के परमाणु रेखा में देखे गए प्रकाश के साथ मेल किया गया। तारा के वास्तविक हाइड्रोजन / हीलियम अनुपात को प्राप्त किया गया जो हीलियम की मात्रा को मापता है। पिछले सभी अध्ययनों में विश्लेषण, सूर्य के समान सामान्य एच-प्रचुरता के आधार पर किया गया था (हीलियम / हाइड्रोजन = 0.1)।

ओमेगा सेंटॉरी के इन ठंढे चमकीले तारों में हीलियम की मात्रा को मापने के लिए, दक्षिणी अफ्रीकी लार्ज टेलीस्कोप (एस ए एल टी ) से प्राप्त उच्च-रिज़ॉल्यूशन स्पेक्ट्रा का उपयोग करके, डॉ हेमा बीपी और भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान, बैंगलोर के प्रो.गजेन्द्र पांडे ने साथ मिलकर अध्ययन किया है। अध्ययन के लिए उन्होंने हार्वर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिज़िक्स, कैम्ब्रिज, यूएसए के प्रो रॉबर्ट एल कुरुक्ज़ और इंस्टीट्यूटो डी एस्ट्रोफिसिका डी कैनारियास और डिपार्टमेन्ट डेस्ट्रॉफ़िसिका, यूनिवर्सिटिड डी ला लगुना, टेनेरिफ़ के प्रो कार्लोस अल्लेंदे प्रेटो का भी सहयोग प्राप्त किया है।

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चित्र 2. लीड 34225 के लिए देखे गए और संश्लेषित एम जी एच बैंड दिखाए गए हैं। Mg I लाइनों से प्राप्त एम जी प्रचुरता के लिए संश्लेषित स्पेक्ट्रा और हाइड्रोजन / हीलियम अनुपात को लाल बिंदीदार रेखा द्वारा दिखाया गया है। हाइड्रोजन / हीलियम के दो मूल्य के संश्लेषण को भी दिखाया गया है।

[प्रकाशन लिंक: https://doi.org/10.3847/1538-4357/ab93bd ]

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