प्रचलित भजन ‘जगदंब अहिं अवलंब हमर हे माई अहां बिनु आस केकर’ के रचियता प्रसिद्ध मैथिलि कवि प्रदीप नहीं रहे

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दरभंगा : मिथिलांचल ही नहीं पूरे बिहार प्रदेश में प्रचलित भजन ‘जगदंब अहिं अवलंब हमर हे माई अहां बिनु आस केकर’ के रचियता व  प्रसिद्ध मैथिलि कवि प्रदीप का निधन हो गया. इस मैथिलि पुत्र ने दरभंगा स्थित लहेरियासराय में शनिवार सुबह अंतिम सांस ली. उनका जन्म 1936 में हुआ था. उनका पैतृक गांव दरभंगा जिले के तारडीह प्रखंड में कैथवार है लेकिन वो बेलवागंज में रहते थे. वे 85 वर्ष के थे.

 

स्वयंप्रभा नगर स्थित अपने आवास पर सुबह साढ़े छह बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। पांच वर्ष पूर्व उन्हें पैरालिसिस का अटैक हुआ था। निधन की सूचना मिलते ही मिथिलांचल के साहित्यिक व आध्यात्मिक जगत सहित उनके भजन को पसंद करने वाले आम लोगों में शोक की लहर दौड़ गयी। उनके अंतिम दर्शन करने वालों का तांता लग गया। नगर विधायक संजय सरावगी भी उनके आवास पर पहुंचे और उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की।

उन्होंने हिंदी व मैथिलि व संस्कृत भाषा पर समान पकड़ रखने वाले प्रदीप ने भगवतगीता व दुर्गासप्तशती के मैथिली अनुवाद के अलावा 2010 में उनकी प्रकाशित रचना श्रीसीताअवतरण सम्पूर्ण महाकाव्य-तिरहुत स तिरुपति धरि बेहद काफी लोकप्रिय रही है। साहित्य व मैथिलि संस्कृति के प्रति समर्पित रहे प्रदीप की 37 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव कैथवार में किया गया।

 

वे बिहार सरकार के प्रारंभिक विद्यालय में सहायक शिक्षक के रूप में भी कार्यरत रहे और 1999 में  सेवानिवृत हुए थे. नौकरी में रहते हुए ही उन्होंने मैथिली की सेवा शुरू कर दी थी. उनके जन्म दिवस पर बड़ी संख्या में उनके शिष्य उनका आशीर्वाद प्राप्त करने उनके आवास पर पहुंचते थे।

 

माँ दुर्गा को समर्पित मिथिला का प्रचलित भजन  ‘जगदंब अहिं अवलंब हमर हे माई अहां बिनु आस केकर’ ने उन्हें मैथिली पुत्र के रूप में अमिट पहचान दी. मैथिलि भाषा की निःस्वार्थ सेवा एवं उनकी अतुलनीय रचनाओं के लिए उन्हें मिथिला रत्न, सुमन साहित्य सम्मान, देह सम्मान, मिथिला रत्न सम्मान, भोगेंद्र झा सम्मान सहित दर्जनों पुरस्कारों से भी नवाजा गया था .

 

उनके परिवार में चार बेटियां और एक बेटे हैं. उनकी पत्नी का निधन पहले हो चुका है. सम्पूर्ण मिथिलांचल उनके निधन पर शोकाकुल है.

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