आखिर कैसे जीता भाजपा ने यूपी का मैदान ?

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नई दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी ने उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में 312 सीटों पर कब्जा कर प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया और सभी न्यूज चैनल एवं अखबारों के अनुमानों व विश्लेषनों को भी पराजित कर दिया है. इसमें कोई दो राय नहीं कि देश का सबसे बड़ा प्रदेश होने के कारण यूपी में भाजपा की जीत के कई महत्वपूर्ण मायने हैं और इसका सीधा असर अब केंद्र की राजनीति पर पड़ना तय है. यह कहना सही होगा कि आने वाले समय में देश के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव में भाजपा की राहें आसन हो गयीं हैं. कांग्रेस एवं सपा सहित सभी विरोधी राजनीतिक दल इस परिणाम से दिग्भ्रमित हैं कि उनकी कोशिश में क्या कमी रही जिससे जनता ने उन्हें इतनी बेरहमी से नकार दिया.  

अगर बात की जाए उत्तर प्रदेश की तो समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से हाथ मिला कर अपनी जीत को पुख्ता करने का इंतजाम कर लिया था और उन्हें इस गठबंधन से बड़ी उम्मीद थी. सपा नेता व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बड़ी व आसान जीत के प्रति आश्वस्त थे, लेकिन गठबंधन पूरी तरह फेल साबित हुआ. आश्चर्यजनक तरीके से इस गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा.

ऐसा माना जा रहा है भाजपा को इस विजय रथ पर चढाने वाले कुछ ख़ास कारण हैं जिनमें उसका जनता के बीच पहुंचाया गया एक ख़ास संदेश है. यह ऐसा कारण साबित हुआ कि यूपी की जनता ने राहुल गाँधी और अखिलेश के साथ साथ बसपा प्रमुख पर भी भरोसा नहीं किया और अगले पांच साल के लिए सत्ता से दूर कर दिया. इस ख़ास संकेत के मिलते ही वहाँ के मतदाताओं ने भाजपा के पाले में जाने में ही प्रदेश की भलाई समझी.

विरोधी दल आपस में लड़ते रहे यहाँ तक कि सपा में पारिवारिक लड़ाई अंत तक जारी रही लेकिन भाजपा ने एक ऐसे बड़े संदेश को जनता के बीच तीव्र गति से पहुंचा दिया  जिसने सपा कांग्रेस के खेल की दिशा को ही बदल डाला. भाजपा के कार्यकर्ता बेहद सधे व प्रभावी तरीके से गुप्त तरीके से पिछड़ा वर्ग एवं दलित समुदाय के लोगों में इसे पहुंचाते रहे और इसमें वे सफल रहे.

अगर पीएम नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में दिए गए भाषण की याद करें तो उन्होंने इसमें भी यह संकेत दिया था. उन्होंने कहा था की विपक्ष को कुछ लोगों की चिंता है और भजपा सबका साथ सबका विकास चाहती है. उनका संकेत साफ़ था कि यू पी में पिछले पांच साल से सत्ता में बैठी सपा के कर्ताधर्ता को केवल दो की ही चिंता है और वह है यादव और मुसलमान. कभी बिहार में माई (एम् वाई) फार्मूला पर चल कर राजद नेता लालू यादव ने यह कोशिश की थी जिसे वहां के लोगों ने लम्बे अर्से तक नकार दिया था. भाजपा ने उत्तरप्रदेश  में सपा पर इसी फोर्मुले पर चलने का बड़ा सधा हुआ आरोप लगा कर उसे इन दोनों समुदायों छोड़ कर  अन्य समुदायों से अलग कर दिया. इस आरोप के लपेटे में कांग्रेस और बसपा भी बह गयी और मुस्लिम व यादव के अलावा सभी जातियों के मतदाताओं ने एकमुश्त भाजपा को समर्थन दे दिया.

इस संकेत को मजबूत करने के कारण भी दिखे. अखिलेश यादव के पांच वर्ष के शासनकाल में सभी प्रकार की नियुक्तियों में केवल और केवल यादव समुदाय के युवाओं  की अधिकता ने इस बात को बल दिया.   अन्य जाती व समुदाय इस अवसर से कथित तौर पर वंचित रखे गए इसमें पिछड़े वर्ग के अन्य जातियों के लोग भी थे .  

पिछले वर्ष में उत्तर प्रदेश के पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा में भी यादव जाति के सबसे अधिक अभ्यर्थियों को सफलता मिलने की घटना ने संदेह पैदा किया. गौरतलब है कि इस मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर याचिका के बाद चेयरमैन डॉ. अनिल यादव के संदेहात्मक कामकाज के कारण कोर्ट ने बोर्ड के चेयरमैन को हटा दिया था. इन घटनाओं ने दूसरे समुदायों को यह सन्देश दिया कि सपा आगर फिर सत्ता में आई तो यादव व मुस्लिम के अलावा अन्य वर्गों के हक़ में कभी काम नहीं होगा और भाजपा  ने इसे ही पूरी तरह अपने पक्ष में कर लिया.

मुलायम सिंह के जमाने से ही सपा पर मुसलमानों के प्रति पर नरम रुख अपनाया जाना घोषित है और अखिलेश यदाव् पर भी  यही आरोप लगे चाहे मुज्जफरनगर के दंगे हों या नोएडा में गौमांस विवाद रहा हो.  इससे हिंदू बहुतायत में एकजुट होकर भाजपा के पक्ष चले गए. कांग्रेस से गठबंधन होने के बाद भी सपा को फायदा नहीं मिला, जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है इन पर तो पहले से ही मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लगते रहे हैं और 2014 लोक सभा चुनाव से ही इनसे लोगों ने किनारा कर लिया है. सपा प्रमुख विकास के नाम पर ‘काम बोलता है’ का नारा देते रहे लेकिन लोगों में विश्वास नहीं बना.  उनके विकास की गाडी लखनऊ के इर्दगिर्द घूमती रही.

बसपा सरकार के दौरान मायावती भी  जाटवों को ही बढ़ावा देने के आरोप से घिरी रहीं. दलित वर्ग में अधिकतर लोगों में यह सन्देश गया कि मायावती सत्ता में आने पर फिर वही करेंगी. मायावती अपने समर्थकों के साथ किसी महारानी की तरह पेश आती हैं और जनता से कट सी गयीं है. ऐसे में लोगों को लगा कि भारतीय जनता पार्टी ही एक मात्र ऐसा दल है जो सबके बारे में सोच रहा है और उसी को वोट देने से सभी जातियों का भला होगा.

अखिलेश यादव व राहुल गांधी स्वयं को  युवाओं के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने में फेल हो गए. सपा परिवार की लड़ाई में तो कांग्रेस कभी खाट सभा तो कभी शीला दीक्षित को सीएम उम्मीदवार बनाए जाने के बीच झूलती रही. इसके उलट भाजपा ने अपने संगठन को मजबूत करने में पूरी ताकत झोंक दी. चुनाव को विकास जैसे मुद्दे से नहीं भटकने दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित उसके स्टार प्रचारकों ने जनता का ध्यान विकास की ओर केंद्रित रखा जिससे अपार बहुमत हासिल करने में सफल रहे

Suvash Chandra Choudhary

Editor-in-Chief

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