राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के तहत मंगोलियाई कंजुर के 108 अंकों का पुनर्मुद्रण आरंभ

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नई दिल्ली : संस्कृति मंत्रालय ने राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (एनएमएम) के तहत मंगोलियाई कंजुर के 108 अंकों के पुनर्मुद्रण करने परियोजना आरंभ की है। एनएमएम के तहत मंगोलियाई कंजुर के पांच पुनर्मुद्रित अंकों का पहला सेट 4 जुलाई, 2020 को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर, जिसे धर्म चक्र दिवस भी कहते हैं, राष्ट्रपति  रामनाथ कोविंद को भेंट किया गया। इसके बाद एक सेट संस्कृति राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)  प्रह्लाद सिंह पटेल द्वारा अल्पसंख्यक मामले राज्य मंत्री  किरेन रिजिजू की उपस्थिति में भारत में मंगोलिया के राजदूत  गोनचिंग गानबोल्ड को सौंपा गया। ऐसी उम्मीद है कि मार्च, 2022 तक मंगोलियाई कंजुर के सभी 108 अंक प्रकाशित कर दिए जाएंगे।

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने धम्म चक्र दिवस के अवसर पर अपने संबोधन में कहा था कि, ‘ गुरु पूर्णिमा के इस पावन दिवस पर, हम भगवान बुद्ध को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस अवसर पर मंगोलियाई कंजुर की प्रतियां मंगोलिया सरकार को भेंट की जा रही हैं। मंगोलियाई कंजुर का मंगोलिया में काफी सम्मान है।‘

 

राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन भारत सरकार के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय द्वारा  फरवरी 2003 में पांडुलिपियों में संरक्षित ज्ञान के दस्तावेजीकरण, संरक्षण एवं प्रसार करने के अधिदेश के साथ लांच किया गया था। मिशन का एक उद्देश्य दुर्लभ एवं अप्रकाशित पांडुलिपियों को प्रकाशित करना है जिससे कि उनमें प्रतिष्ठापित ज्ञान शोधकर्ताओं, विद्वानों एवं बड़े पैमाने पर आम लोगों तक प्रसारित हो सके। इस योजना के तहत, मंगोलियाई कंजुर के 108 अंकों के पुनर्मुद्रण का कार्य मिशन द्वारा आरंभ किया गया है। ऐसी उम्मीद है कि मार्च, 2022 तक मंगोलियाई कंजुर के सभी 108 अंक प्रकाशित कर दिए जाएंगे। यह कार्य विख्यात विद्वान प्रो. लोकेश चंद्रा के पर्यवेक्षण के तहत किया जा रहा है।

 

108 अंकों का बौद्ध धर्म वैधानिक ग्रंथ मंगोलियाई कंजुर मंगोलिया में सर्वाधिक महत्वपूर्ण धर्म ग्रंथ माना जाता है। मंगोलियाई भाषा में ‘कंजुर‘ का अर्थ होता है ‘संक्षिप्त आदेश‘ जो विशेष रूप से भगवान बुद्ध के शब्द होते हैं। मंगोलियाई बौद्धों द्वारा इसका काफी सम्मान किया जाता है तथा वे मंदिरों में कंजुर की पूजा करते हैं तथा एक धार्मिक रिवाज के रूप में अपने प्रतिदिन के जीवन में कंजुर की पंक्तियों का पाठ करते हैं। मंगोलिया में लगभग प्रत्येक बौद्ध मठ में कंजुर को रखा जाता है। मंगोलियाई कंजुर को तिब्बती भाषा से अनुदित किया गया है। कंजुर की भाषा शास्त्रीय मंगोलियाई है। मंगोलियाई कंजुर मंगोलिया को एक सांस्कृतिक पहचान उपलब्ध कराने का स्रोत है।

 

समाजवादी अवधि के दौरान काष्ठ चित्रों को जला दिया गया था और मठ अपने पवित्र ग्रंथों से वंचित हो गए थे। 1956-58 के दौरान, प्रोफेसर रघु वीरा ने दुर्लभ कंजुर पांडुलिपियों  की एक माइक्रोफिल्म प्रति प्राप्त की और उसे भारत लेकर आ गए और 108 अंकों में मंगोलियाई कंजुर भारत में 1970 के दशक में राज्यसभा के पूर्व सांसद प्रो. लोकेश चंद्रा द्वारा प्रकाशित किया गया। अब वर्तमान संस्करण का प्रकाशन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन द्वारा किया जा रहा है जिसमें प्रत्येक अंक में कंटेंट की एक सूची है जो मंगोलियाई में सूत्र के मूल शीर्षक को इंगित करती है।

 

भारत और मंगोलिया के बीच ऐतिहासिक परस्पर संबंध सदियों पुराने हैं। मंगोलिया में बौद्ध धर्म भारतीय सांस्कृतिक एवं धार्मिक राजदूतों द्वारा आरंभिक ईस्वी के दौरान ले जाया गया था। इसके परिणामस्वरूप, आज मंगोलिया में बौद्धों का सबसे बड़ा धार्मिक प्रभुत्व है। भारत ने 1955 में मंगोलिया के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए। तब से, दोनों देशों के बीच प्रगाढ़ संबंध एक नई ऊंचाई तक पहुंच गए हैं। अब भारत सरकार द्वारा मंगोलियाई सरकार के लिए मंगोलियाई कंजुर का प्रकाशन भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक सिम्फनी के प्रतीक के रूप में कार्य करेगा तथा आने वाले वर्षों में द्विपक्षरीय संबंधों को और आगे ले जाने में योगदान देगा।

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