मधुरेन्द्र की उंगलियाँ सचमुच बोलती हैं : चंद्रभागा बीच पर देखने लाखों देशी-विदेशी उमड़े

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नीरज कुमार सिंह

भुनेश्वर : ओडिशा स्थित पूरी के समुद्री तट पर आयोजित पांच दिवसीय अंतराष्ट्रीय रेत कला उत्सव में बिहार के लाल मधुरेन्द्र की रचना “सेव मरीन लाइफ” को देखने देश व विदेश के लाखों लोग उमड़ पड़े. जिला पूर्वी चंपारण के घोड़ासहन बिजबनी गांव निवासी इस मशहूर युवा सैंड आर्टिस्ट का जलीय जीवों के संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक करने का यह प्रयास लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया. पदमश्री सुदर्शन पटनायक भी रेत से तैयार इस आकर्षक कलाकृति के मुरीद बन गए और मधुरेन्द्र के जनहित के सन्देश देने के तरीके की जमकर प्रशंसा की. पर्यटकों के लिए यह ख़ास आयोजन ओडिशा के कोणार्क  स्थित चंद्रभागा बीच पर ओडिशा पर्यटन विभाग की ओर से किया गया है.

THEPUBLICWORLD.COM  न्यूज पोर्टल से बातचीत में मधुरेन्द्र ने समुद्र में रहने वाले जीवों की विलुप्त होती जा रही हजारों प्रजातियों के प्रति चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा कि  जनहित से जुड़े विषयों को उजागर करने के लिए वे हमेशा अपनी कला को माध्यम बनाते हैं. उनकी नजरों में साहित्य हो या कला देश हित और सामाजिक जागरूकता हमारा ध्येय होना चाहिए. इन्हीं दृष्टिकोण से उन्होंने मंगलवार को ओड़िसा के चंद्रभागा समुन्द्र तट पर आयोजित पांच दिवसीय उत्सव का तीसरा दिन जलीय जीवों के संरक्षण को समर्पित किया. लगभग 6 घंटे के अथक प्रयास के बाद रेत से विशाल कलाकृति का निर्माण किया.

मधुरेन्द्र ने जलीय जीवों की बदहाल स्थिति को लेकर विशालकाय समुद्र के देवता की दुखद मनःस्थिति को इस कदर दर्शाया है जैसे वह मानव समुदाय से स्वयं ही अपनी दर्दनाक कहानी कहना चाहते हों. उन्होंने इसमें समुद्र के आगोश में रहने वाले हजारों प्रकार के जीव जंतुओं का सजीव चित्रण भी शामिल किया है. एक तरफ डोल्फिन तो दूसरी तरफ व्हेल मछली को दर्शाया है. समुद्र तल में रहने वाली हजारों प्रजातियों की स्पष्ट आकृति दिखाते हुए लोगों को बताने की कोशिश की है कि मानवकृत प्रदूषण एक साथ कितने जीवों को नुक्सान पहुंचा रहा है. इससे इकोसिस्टम को कितना बड़ा नुक्सान होने वाला है. युवा कलाकार ने इस कलाकृति में अपनी कल्पना को मूर्तरूप देने की शानदार कोशिश की है. अपनी अनोखी कला से कई ऐसे जीवों को भी दर्शाया है जो अब नगण्य है और दुनिया के लिए वेशकीमती हैं. इसमें बनाये गए शंख और सीप की मुद्रा इसके  वास्तविक स्वरूप को तो दर्शाते ही हैं साथ ही भारतीय संस्कृति से समुद्र और उसमें पाए जाने वाले रत्नों की ओर भी इशारा कर रहे हैं. समुद्र की पारिस्थिकी को संतुलित रखने में बेहद मददगार कछुवे के शिकार के प्रति भी मधुरेन्द्र ने इसके माध्यम से लोगों को आगाह किया है.

“सेव मरीन लाइफ” की थीम को देखने हजारों पर्यटक उमड़ पड़े. उल्लेखनीय है कि समुद्री जीवों के संरक्षण को लेकर दुनिया में आज बड़े पैमाने पर पर्यावरण विशेषज्ञों ने आन्दोलन चला रखा है. इसमें गुजरने वाले समुद्री जहाज को इसके लिए सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है. हाल के वर्षों में इस विषय पर लोगों में जागरूकता तो बढ़ी है लेकिन समुद्री जीवों पर प्रदूषण का खतरा भी बढ़ा है. ऐसे में बिहार के इस युवा सैंड आर्टिस्ट का यह विशाल सैंड आर्ट बेहद प्रासंगिक लग रहा है जिससे यह ओडिशा में पर्यटकों के लिए कोतुहल का विषय बना गया. अंतराष्ट्रीय रेत कला उत्सव में आयरलैंड, कनाडा, रसिया, डेनमार्क, टॉगों, व श्रीलंका सहित सार्क देशों के सैंड आर्टिस्ट ने भी मधुरेंद्र की इस संदेशपरक कलाकृति को सराहा.

यह आयोजन 1 से 5 दिसंबर कोणार्क के चंद्रभागा बीच पर आयोजित किया गया है. इसमें सार्क सदस्यों देशों भारत, श्रीलंका, यू एस ए, अमेरिका, स्पेन, इटली, कोलंबो, मलेशिया और रूस सहित अन्य कई देशों के 18 से लेकर 80 वर्ष तक के सौ  सैंड आर्टिस्ट अपनी कला का प्रदर्शन करने आये हैं. इसमें सभी कलाकर वर्ल्ड हेरिटेज, त्योहार, मेला, प्रकृति व पर्यावरण के साथ महान पर्व व संस्कृति पर आधारित कला का प्रदर्शन कर रहे हैं.  ये सभी सैंड आर्टिस्ट अपने-अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

कलाकृतियों से समाज को संदेश

25 वर्षीय इस युवा कलाकार मधुरेन्द्र की अँगुलियों में कमाल की शिफत है. रेत जैसे बेकार पदार्थों को भी यह अपनी कला से जीवंत कर देता है. रोड पर फेंके हुए कचरे व गुटखों के रैपर से तैयार इनकी कलाकृतियां लोगों को नशीले चीजों के सेवन से बचने का संदेश देती हैं तो दूसरी तरफ महापुरुषों की जयंती से लेकर श्रंद्धाजलि देने का सशक्त माध्यम भी. भारतीय संस्कृति के धरोहर और विरासतों की साक्षात झलक देना इनके बाएं हाथ का खेल है जबकि इनके द्वार रेत से बनाई देवी-देवताओं की आकर्षक प्रतिमाओं को देख भौंचक रह जाते हैं. स्क्रप्चर एंड आर्ट्स में वीर कुवर सिंह विश्वविद्यालय से बीए ओनर्स कर अपनी कला को निखारने वाले मधुरेन्द्र की कला का अधिकतर विषय मानवकल्याण सम्बन्धी है. मसलन मानव स्वाथ्य, नशा का दुष्प्रभाव, मधनिषेध, धूम्रपान निषेध, बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ, नारी उत्पीड़न, मजबूर-बेबस, हिंसा, शोषण, बाल मजदूर, भ्रूण हत्या, जल संरक्षण, जलवायु और मृदा प्रदूषण, पशु-पंछी संरक्षण, जनसंख्या नियंत्रण, प्रकृति आपदा व आतंकवाद जैसे जवलंत विषय अब तक इनकी कला का थीम बन चुके हैं जिन्हें सरकारी व गैरसरकारी फोरम पर खूब सरहाना मिली है.

कई पुरस्कार भी मिले :

सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र को 2019 के लोकसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग का ब्राण्ड अम्बेसडर बनाया गया था. इसके अलावे राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार जैसे इंटरनेशनल सैंड आर्ट फेस्टिवल अवार्ड, राष्ट्रपति सम्मान, भारत नेपाल मैत्री संबंध सम्मान, फ्रेंडशिप ऑफ इंडिया एंड अमेरिका सम्मान, वैश्विक शान्ति पुरस्कार, बिहार गौरव अवार्ड, विश्वप्रसिद्ध सोनपुर मेला सम्मान,  बिहार रत्न, शाहिद सम्मान, कला सम्राट सम्मान, आम्रपाली पुरस्कार, चम्पारण रत्न, वैशाली गणराज्य सम्मान, केसरिया महोत्सव सम्मान, बांका महोत्सव सम्मान,  चम्पारण गौरव अवार्ड, बौद्ध महोत्सव सम्मान, वैशाली महोत्सव सम्मान, मिस्टर चम्पारण, राजगीर महोत्सव सम्मान, थावे महोत्सव सम्मान, आईकॉन ऑफ चम्पारण, मगध रत्न अवार्ड व युथ आईकॉन अवार्ड सहित सैकड़ों से इन्हें नवाजा जा चूका है.

मध्यमवर्गीय परिवार का सदस्य मधुरेन्द्र

अंतराष्ट्रीय रेत कला उत्सव में वर्ष 2018 से शामिल होकर स्वयं को स्थापित कर चुके सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र का जन्म 5 सितंबर 1994 को बिहार राज्य के जिला पूर्वी चंपारण स्थित बरवाकला गांव ननिहाल में हुआ. वही इनका पालन पोषण भी  हुआ। ये अपने 5 भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। 6-7 साल के उम्र में अपने पैतृक गांव लौटा तो वही पिताजी ने प्रारम्भिक शिक्षा  के लिए बाबा नरसिंह के रमना नामक आश्रम में दाखिला करा दिया. आश्रम के सामने एक छोटा तालाब था, उसमें हंस की झुंड रोज तैरती थी. एक दिन मधुरेन्द्र ने तालाब में तैरते हुए हंस की तस्वीर स्लेट पर पेंसिल से बना दी। इस सजीव तस्वीर को देख बाबा नरसिंह ने इनकी पीठ थपथपाई और बोल उठे यह कलाकार बनेगा और एक दिन अपनी कलाकारी से समाज और देश का सम्मान बढ़ाएगा।

फिर घर लौट कर अपने माता-पिता के साथ खेतों में काम करना। बकरी व भैस जैसी पशुधन को चारा देने के साथ उसके रख-रखाव का ख्याल रखना। दही, दुग्ध और माखन बेचना। बाजार व मेलों में झाल मुड़ी और भाजी बेचना। डेली और टोकरी बुनकर बेचना आदि घरेलू कार्य करने के बावजूद भी गांव से 2 किलोमीटर दूर घोड़ासहन शहर में एक छोटे साइन बोर्ड पेंटिंग का स्टूडियो चलाने जैसी जिम्मेदारी भी निभानी पड़ी. बचपन से ही पढ़ाई से ज्यादा कलाकारी करने में मन लगता था और खेतों में भी मिटटी से मूर्तियाँ बनाने में व्यस्त रहते और परिवार से डांट मिलती थी. इस कारण पढ़ाई विधिवत नहीं हो पायी।

2011 से मिली पहचान

विषम परिस्थितियों में भी ये अपनी कला साधना में लीन रहते हैं और देश में विभिन्न स्थानों पर होने वाले आयोजनों की तैयारी में जुटे रहते हैं. 2011 में बिहार सरकार की ओर से जिला के गांव केसरिया में आयोजित महोत्सव में पहली बार अपनी कला से लोगों को परिचय कराया. अब अपनी बेमिसाल कलाकारी का एक से बढ़ कर एक बेहतरीन नमूना पेश कर आये दिन देश- दुनियां को को नया पैगाम देने में जुटे रहतें हैं। अब तक की इनकी यात्रा से स्पष्ट है कि रेत से सृजन कर दुनिया को सन्देश देना इनके जीवन का ध्येय बन गया है.

कला के प्रदर्शन के लिए रेत ही क्यों चुना ?

मधुरेन्द्र बताते हैं कि प्रारम्भिक दौड़ में अपने खेतों के मेड़ की मिट्टी को काट कर छोटे-छोटे आकर में अपनी कल्पना को मिट्टी का आकर देते थे. फिर उसे और बड़ा आकर देने के लिए बालू को चुना. इनका कहना है कि रेत पर किसी भी आकृति को उकेरना आसान लगने लगा और आज इससे विशाल से विशाल मूर्तियां बनाने में आसानी होती है। आज मिट्टी के अलावे बड़े बड़े महापुरुष, राजनेता, साधू-संत, सन्यासी, देवी-देवताओं, शहीदों तथा पूर्वजों की मूर्तियां को तांबा, पीतल, एल्युमिनियम , फाइबर, सीमेंट तथा प्लास्टर ऑफ पेरिस से भी मूर्तियां बनाते हैं. इनकी बनाई मूर्तियाँ दर्जनों से ज्यादा स्मारकों पर स्थापित हो चुकी हैं। बावजूद इसके अपनी कला का व्यावसायिक उपयोग नहीं करता चाहते हैं.

कहाँ कहाँ किया कला का प्रदर्शन ?

मधुरेन्द्र नेपाल के विश्वप्रसिद्ध गढ़ीमाई मेला, एशिया फेम सोनपुर मेला व सरकारी महोत्सव तथा देश-प्रदेश  के विभिन्न सभी छोटे-बड़े शहरों मुंबई, महाराष्ट्र, दिल्ली, गाजियाबाद, पंजाब, भटिंडा, उत्तर प्रदेश, लखनऊ, इलाहाबाद, पश्चिम बंगाल, ओड़िसा, किशनगंज, राजगीर, बोधगया, थावे तथा चम्पारण में भी अपनी कला प्रदर्शन कर चुके हैं।

पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी थे मुरीद

देश पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने भी 2012 में मधुरेन्द्र द्वारा बनाई गयी विकसित देश भारत में विज्ञान के विकास का महत्व पर आधारित कलाकृति को देख प्रसंशा की थी। वही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और ओड़िसा के गवर्नर प्रो गणेशी लाल सहित बड़े-बड़े राजनेताओं व वरिष्ठ  प्रसाशनिक अधिकारियों तथा देश-विदेश के सैलानी भी इनकी कला के मुरीद है.

 

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