वर्ष 2019 में कैसा रहा कारपोरेट मंत्रालय का कामकाज ?

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नई दिल्ली। व्यवसाय जगत के सभी पक्षो को अधिक व्यावसायिक सुगम्यता प्रदान करने, कॉरपोरेट ढांचे में पारदर्शिता लाने तथा कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत प्रक्रिया सक्षमता बढ़ाने के लिए बेहतर कॉरपोरेट परिपालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (एमसीए) ने पिछले एक वर्ष (जनवरी-नवम्बर, 2019) में अनेक उल्लेखनीय कदम उठाए हैं/ निर्णय लिये हैं।

भारत ने विश्व बैंक की “डूइंग बिजनेस” 2020 रिपोर्ट में अपनी रैंकिंग में सुधार किया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की रैंकिंग 14 पायदान ऊपर उठकर 63वें स्थान पर आ गयी है। 2018 में भारत का स्थान 77वां था। व्यावसायिक सुगम्यता रैंकिंग में भारत की 14 रैंक की छलांग काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की रैंकिंग में 2015 से लगातार सुधार हुआ है और भारत लगातार तीन वर्ष से सुधार करने वाले शीर्ष 10 देशों में है। कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने दिवाला समाधान में योगदान दिया है।

रिज़ॉल्विंग इन्सॉल्वेंसी इंडेक्स (दिवाला समाधान सूचकांक) में नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत 2019 में 56 स्थानों की छलांग लगा कर 52वें स्थान पर पहुंच गया है। 2018 में भारत की रैंकिंग 108 थी। वसूली दर 2018 के 26.5% से बढ़कर 2019 में 71.6% हो गई। वसूली में लगने वाला समय 2018 के 4.3 तीन वर्ष की तुलना में सुधर कर 2019 में 1.6 वर्ष हो गया है।

हाल में मंत्रालय द्वारा कानून पालन करने वाले कॉरपोरेट्स को व्यावसायिक सुगम्यता प्रदान करने के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं, जो इस प्रकार हैं :

  • एकीकृत निगमन फॉर्म – इलेक्ट्रॉनिक रूप से कंपनी को निगमित करने के लिए सरलीकृत प्रोफार्मा (एसपीआईसी-ई) लागू किया गया है, जो एक ही फॉर्म के माध्यम से तीन मंत्रालयों की 8 सेवाओं (सीआईएन, पैन, टिन, डीआईएन, नाम, ईपीएफओ, ईएसआईसी और जीएसटीएन) को समाहित करता है।
  • कंपनी अधिनियम के तहत तकनीकी और प्रक्रिया सम्बंधी उल्लंघनों का वैधीकरण और कंपनी (संशोधन) विधेयक, 2019 के माध्यम से 16 अपराधों से जुड़े अनुच्छेदों को मौद्रिक दंड व्यवस्था के अंतर्गत लाकर आपराधिक न्यायालयों और एनसीएलटी पर बोझ को कम किया गया है। इस विधेयक को 31 जुलाई, 2019 को अधिसूचित किया गया।
  • कंपनियों और एलएलपी के नाम आरक्षण के लिए “आरयूएन – रिजर्व यूनिक नेम” वेब सेवा लागू करके सरकारी प्रक्रिया को नया स्वरूप दिया गया। डायरेक्टर आइडेंटिफिकेशन नंबर (डीआईएन) के आवंटन की प्रक्रिया को नया रूप दिया गया। 15 लाख रुपये तक की प्राधिकृत पूंजी वाली कंपनी के निगमीकरण के लिए शून्य एमसीए शुल्क व्यवस्था, विलंब योजना (सीओडीएस) 2017 की माफी।
  • देश में कंपनियों के विलय और अधिग्रहण में तेजी लाने के लिए प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के तहत संशोधित डी-मिनिमाइज छूट।
  • ग्रीन चैनल के तहत सीसीआई द्वारा संयोजन के लिए स्वीकृति की एक स्वचालित प्रणाली लागू की गई। इस प्रक्रिया के तहत निर्धारित प्रारूप में नोटिस दाखिल करने के बाद संयोजन को मंजूर समझा जाता है। यह प्रणाली महत्वपूर्ण रूप से लेनदेन के समय और लागत में कमी करगी देगी।
  • निजी कंपनियों, सरकारी कंपनियों, धर्मादा कंपनियों, निधियों तथा आईएफएससी (गिफ्ट सिटी) कंपनियों को कंपनी अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों से छूट।
  • अंतरीय वोटिंग अधिकारों (डिफरेंशियल वोटिंग राइट्स – डीवीआर) के साथ शेयर जारी करने संबंधी प्रावधानों को संशोधित किया गया है ताकि भारतीय कंपनियों के प्रवर्तकों को कंपनी के विकास और शेयर धारकों के लिए दीर्घकालिक मूल्य सृजन के लिए वैश्विक निवेशकों से इक्विटी पूंजी उगाहने पर भी, अपनी कंपनियों का नियंत्रण बनाए रखने में सक्षम बनाया जा सके।
  • कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत मध्यस्थता तथा सुलह से संबंधित सक्षम प्रावधानों को लागू किया गया।
  • सार्वजनिक इश्यू की समय सीमा कम करके सेबी के साथ मानकों को सामन्जस्यपूर्ण बनाया गया ताकि निवेशक पहले के 6 दिनों के बदले आवेदन करने के 3 दिन के अंदर प्रतिभूतियां प्राप्त कर सकें।
  • अधिनियम के अनुच्छेद 232(6) को लाने के बारे में स्पष्टीकरण दिया गया है। इससे अनुच्छेद विलय/एकीकरण की निर्धारित तिथि का पता करने में व्यवहारों में सामंजस्य आएगा और लेखा व्यवस्था पर उचित स्पष्टता प्रदान की जा सकेगी। फलस्वरूप हितधारकों को अपने व्यावसायिक चिंताओं और कानूनी आवश्यकताओं के अनुसार विलय/ एकीकरण की निर्धारित तिथि से जुड़ने की अनुमति दी जा सकेगी। इससे व्यावसायिक सुगम्यता में काफी योगदान होगा।
  • डिबेंचर रिडेम्प्शन रिजर्व (डीआरआर) बनाने सम्बंधी प्रावधानों में संशोधन किया गया। ताकि निम्नलिखित उपाय करके बॉन्ड बाजार को प्रगाढ़ बनाया जा सके और पूंजी लागत घटायी जा सके :
  • सूचीबद्ध कंपनियों, भारतीय रिजर्व बैंक से पंजीकृत गैर-बैकिंग वित्तीय कंपनियों तथा राष्ट्रीय आवास बैंक (एनएचबी) के साथ पंजीकृत आवास वित्त कंपनियों के मामले में सार्वजनिक इश्यू के साथ-साथ प्राइवेट प्लेसमेंट के लिए डिबेंचर के 25 प्रतिशत मूल्य का डीआरआर बनाने के लिए आवश्यकताओं की समाप्ति।
  • गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के लिए डीआरआर को बकाया डीबेंचरों के वर्तमान 25 प्रतिशत के स्तर से घटाकर 10 प्रतिशत करना।
  • स्वतंत्र निदेशकों का डाटाबैंक लॉन्च किया गया ताकि वर्तमान स्वतंत्र निदेशकों के साथ-साथ स्वतंत्र निदेशक बनने के आकांक्षी व्यक्तियों के पंजीकरण के लिए सहज पहुंच योग्य प्लेटफार्म प्रदान किया जा सके।
  • कंपनियों तथा एलएलपी के नाम आरक्षण और निगमीकरण बनाने के लिए पहले के कम से कम 15 दिनों के औसत के स्थान पर 1-2 दिनों के अंदर केंद्रीय पंजीकरण केंद्र स्थापित करना।
  • देश में प्रत्येक वर्ष 1,25,000 से अधिक कंपनियां पिछले तीन वर्षों में निगमित की गई हैं। पहले के वर्षों में 50-60,000 कंपनियां निगमित की गई थीं।
  • गैर-सूचीबद्ध सार्वजनिक कंपनियों की प्रतिभूतियों को अमूर्त बनाना।
  • कंपनियां (पंजीकृत वैल्लुअर्स तथा वैल्युएशन) नियम।
  • कंपनी (दंडों के न्यायिक निर्णय) नियम संशोधित किये गए ताकि प्रक्रिया पारदर्शी और भेदभाव रहित बनाई जा सके।
  • उत्तरदायी व्यवसाय आचरण पर राष्ट्रीय दिशा-निर्देश
  • कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत 14,000 से अधिक मुकदमें वापस लिये गए।
  • संबंधित पक्ष लेनदेन से संबंधित प्रावधानों को विवेकसंगत बनाया गया है।
  • कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत दंडनीय प्रावधानों के वैधीकरण का चरण-II प्रारंभ
  • प्रथम राष्ट्रीय सीएसआर पुरस्कार प्रदान किये गए।

मजबूत दिवाला और दिवालियापन ढांचा संस्थान बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए :

  • दिवाला और दिवालियापन संहिता (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा में 12 दिसंबर, 2019 को प्रस्तुत किया गया। विधेयक के उद्देश्य और कारण के अनुसार कंपनी को कॉरपोरेट दिवाल समाधान प्रक्रिया या परिसमापन में जाने पर कुछ वित्तीय कर्जदाताओं के निश्चित वर्ग द्वारा दुरुपयोग की संभावना को रोकने के लिए कॉरपोरेट देनदारों को अंतिम मील के वित्तपोषण के लिए पुनर्भुगतान में प्राथमिकता देने की आवश्यकता महसूस की गई। अभियोजन से कॉरपोरेट कर्जदारों को छूट प्रदान करने और कॉरपोरेट कर्जदार की संपत्ति के विरूद्ध कार्रवाई करने तथा कुछ शर्तों को पूरा करने पर सफलतापूर्वक समाधान की आवश्यकता भी महसूस की गई।
  • दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, 2019संसद द्वारा पारित किया गया और यह 16.08.2019 से प्रभावी है। संशोधित विधेयक में मामलों की समय से निपटान, संपत्तियों के मूल्य को अधिकाधिक करने के लिए कॉरपोरेट पुनर्संरचना में लचीलापन ऋणदाताओं की सर्वोच्चता सुरक्षित रखना और घर खरीददारों के वोटिंग गतिरोध को समाप्त करने का प्रावधान है।
  • 15 नवम्बर, 2019 को दिवाला और दिवालियापन (वित्तीय सेवा प्रदाताओं की दिवाला और परिसमापन कार्यवाहियों तथा न्यायिक निर्णय प्राधिकार) नियम, 2019 जारी किये गए। इन नियमों में बैंकों को छोड़कर वित्तीय सेवा प्रदाताओं (एफएसपी) की दिवाला और परिसमापन कार्यवाहियों के लिए सामान्य रूपरेखा प्रदान की गई है। दिवाला और परिसमापन कार्यवाहियों के उद्देश्य के लिए ऐसे एफएसपी या एफएसपी की श्रेणियों में लागू होने वाले नियम अनुच्छेद 227 के अंतर्गत केन्द्र सरकार द्वारा उचित नियामकों के परामर्श से समय-समय पर अधिसूचित किए जाएंगे। इन नियमों का आवश्यक उद्देश्य बैंकों के वित्तीय समाधान तथा प्रणालीबद्ध रूप से अन्य महत्वपूर्ण वित्तीय सेवा प्रदाताओं से निपटने के लिए संपूर्ण विधेयक (एफआरडीआई विधेयक) पारित करने से पहली की आवश्यक स्थिति में अंतरिम व्यवस्था बनाना है।
  • आईबीसी के अनुच्छेद 2 की धारा (ई) की अधिसूचना 15 नवंबर, 2019 को लागू की गई और 01 दिसंबर, 2019 से लागू किया गया। इसके माध्यम से आईबीसी के अंतर्गत कॉरपोरेट कर्जदारों के व्यक्तिगत जमानतियों के दिवालियापन को आईबीसी के दायरे में लाया गया है। आईबीसी के अंतर्गत व्यक्तिगत जमानतियों के दिवाला समाधान और दिवालियापन कॉरपोरेट कर्जदारों के दिवालिया समाधान का पूरक होगा और इससे व्यक्तिगत जमानती और कॉरपोरेट जमानती बराबरी के स्तर पर आ जाएंगे। इससे उधारी अनुशासन कायम होगा और बैंकिंग संबंधों में सांस्कृतिक बदलाव को प्रोत्साहन मिलेगा।
  • दिवाला और दिवालियापन (व्यक्तिगत जमानतियों से लेकर कॉरपोरेट कर्जदारों के लिए दिवाला समाधान प्रक्रिया के न्यायिक निर्णय प्राधिकार) नियम
  • 15 नवंबर, 2019 को दिवाला और दिवालियापन (व्यक्तिगत जमानतियों से लेकर कॉरपोरेट कर्जदारों के लिए दिवाला समाधान प्रक्रिया के न्यायिक निर्णय प्राधिकार) नियम, 2019 जारी किए गए और इसे 1 दिसंबर, 2019 से लागू किया जाएगा। चरणबद्ध तरीके से लागू की जा रही दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) के अंतर्गत व्यक्तियों के लिए समाधान का प्रावधान नियमों में है। आईबीसी में कॉरपोरेट व्यक्तियों, पार्टनरशिप फर्मों तथा व्यक्तियों के दिवाला का समयबद्ध समाधान की व्यवस्था है ताकि ऐसे व्यक्तियों की परिसम्पत्तियों के मूल्यों को अधिक से अधिक किया जा सके, उद्यमिता तथा ऋण उपलब्धता को प्रोत्साहित किया जा सके और सभी हितधारकों के हितों को संतुलित बनाया जा सके। कॉरपोरेट प्रक्रियाओं (दिवाला समाधान, फास्ट ट्रैक समाधान, परिसमापन तथा स्वैच्छिक परिसमापन) से सम्बंधित आईबीसी के प्रावधान लागू कर दिये गये हैं। इन नियमों में दिवाला समाधान प्रारंभ करने और सीडी के व्यक्तिगत जमानतियों के विरूद्ध दिवालियापन प्रक्रिया प्रारंभ करने की व्यवस्था है। नियमों में ऐसे आवेदनों की वापसी, ऋणदाताओं से दावे आमंत्रित करने के लिए सार्वजनिक नोटिस के फार्म आदि का भी प्रावधान है।
  • दिवाला और दिवालियापन संहिता में दो बार 2018 में संशोधन हुए। इसका उद्देश्य समाधान प्रक्रिया में चल रही कंपनियों का फिर से नियंत्रण प्राप्त करने से आवांछित व्यक्तियों को अयोग्य घोषित करना तथा घर खरीदने वालों और सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमियों के हितों को संतुलित बनाना ऋणदाताओं की समिति की वोटिंग सीमा को घटाकर परिसमापन के ऊपर समाधान को प्रोत्साहित करना और समाधान आवेदनकर्ताओं की पात्रता से संबंधित प्रावधानों को विवेकसंगत बनाना है।

अब तक दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 (आईबीसी) की उपलब्धियां :

  • दायर 21,136 आवेदनों में से :
  • लगभग 3,74,931.30 करोड़ रुपये की कुल राशि के 9,653 मामलों को आईबीसी के मंजूरी पूर्व चरण में निपटाया गया है।
  • 2,838 मामलों को कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) में मंजूर किया गया जिसमें से 306 मामले अपील/ पुनर्विचार/ वापस लेने से बंद हो गए हैं।
  • समाधान किये गए 161 मामलों में वसूली योग्य राशि 1,56,814 करोड़ रुपये है।
  • वर्ल्ड बैंक डूइंग बिजनेस रिपोर्ट 2020 – दिवाला सूचकांक समाधान।
  • भारत की रैंकिंग 2018 के 108वें स्थान की तुलना में 2019 में 56 पायदान की छलांग के साथ 52वें स्थान पर पहुंच गई।
  • वसूली दर 2018 के 26.5% से बढ़कर 2019 में 71.6% हो गई।
  • 2018 में वसूली में लगने वाला समय 4.3 वर्ष से बेहतर होकर 2019 में 1.6 वर्ष हो गया।

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